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इमेज कैप्शन, दुनिया भर के युवाओं का औसत कद 100 साल पहले के उनके पुरखों से लगभग 10 सेंटीमीटर ज़्यादा है (सांकेतिक तस्वीर)
    • Author, कैथरीन हीटवुड
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
  • प्रकाशित 3 मिनट पहले

  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

अगर आप अपने पुरखों से अपने कद की तुलना करें, तो बहुत संभावना है कि आप उनसे ज़्यादा लंबे हों. शोध से जुड़ी वेबसाइट 'आवर वर्ल्ड इन डेटा' के मुताबिक़, आज दुनिया भर के युवाओं का औसत कद 100 साल पहले के उनके पुरखों से लगभग 10 सेंटीमीटर ज़्यादा है.

साल 2016 में हुए एक अध्ययन में 1896 और 1996 में जन्मे लोगों की तुलना की गई थी. इस अध्ययन में पता चला कि दक्षिण कोरिया की महिलाओं और ईरान के पुरुषों के कद में सबसे ज़्यादा बढ़ोतरी हुई है. दक्षिण कोरियाई महिलाओं का कद औसतन 20 सेंटीमीटर और ईरानी पुरुषों का कद 17 सेंटीमीटर बढ़ा है.

स्कॉटलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ़ एबरडीन में ग्लोबल हेल्थ की सीनियर लेक्चरर डॉ. अरविंदा गुंटुपल्ली कहती हैं कि इसके पीछे बेहतर खानपान, बीमारियों से जुड़े हालात में सुधार, टीकाकरण और कई दूसरे कारण हैं. लेकिन इंसानों का कद हमेशा बढ़ता ही नहीं रहा है.

हज़ारों वर्षों के दौरान खानपान, युद्ध, बीमारियों और समाज में आए दूसरे बड़े बदलावों के कारण कभी इंसानों का कद बढ़ा, तो कभी घट गया.

इतिहास के बारे में कद से क्या पता चलता है?

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इमेज कैप्शन, "ज़्यादा लंबा कद बेहतर जीवन स्तर की निशानी है" (सांकेतिक तस्वीर)

शोधकर्ताओं का कहना है कि जब इतिहास या आंकड़ों से जुड़ी दूसरी जानकारियां उपलब्ध नहीं होतीं, तो लोगों की लंबाई से उनके जीवन स्तर के बारे में एक बड़ी तस्वीर समझी जा सकती है.

आर्थिक इतिहासकार और क्वींस यूनिवर्सिटी बेलफ़ास्ट के प्रोफ़ेसर डॉक्टर मथियास ब्लम कहते हैं, "लंबाई लोगों की ख़ुशहाली मापने का एक अच्छा पैमाना है."

अध्ययनों से पता चलता है कि किसी व्यक्ति की लंबाई का 80 या यहां तक कि 90 फ़ीसदी हिस्सा उसके जीन तय करते हैं.

बाक़ी हिस्सा भले ही कम हो, लेकिन उस पर खान-पान, बीमारियों के संपर्क में आने, बचपन के माहौल और इलाज की सुविधा मिलने जैसे कारणों का असर पड़ता है.

ब्लम कहते हैं, "ज़्यादा लंबा कद बेहतर जीवन स्तर की निशानी है."

उनका कहना है कि जीन में मौजूद अंतर का असर कम करने के लिए शोधकर्ता बड़ी आबादी की औसत लंबाई का अध्ययन करते हैं.

इससे वे ऐसे बदलावों और असमानताओं का पता लगा सकते हैं, जो सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी जैसे पैमानों में दिखाई नहीं देते.

क्या खेती शुरू करने से इंसानों का कद घट गया?

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ब्लम के मुताबिक़, इंसानों के कद के इतिहास में दो बड़े मोड़ आए.

पहला बदलाव नवपाषाण क्रांति के समय आया. यह वह दौर था, जब लगभग 10 से 12 हज़ार साल पहले इंसानों ने शिकार करने और जंगलों से भोजन जुटाने की जगह खेती करना शुरू किया.

इतने पुराने समय में इंसानों के कद में हुए बदलावों को समझने के लिए शोधकर्ताओं को कंकालों से मिली जानकारी पर निर्भर रहना पड़ता है. हालांकि, इस तरह मिलने वाली जानकारी की अपनी सीमाएं हैं.

फिर भी अधिकतर शोधकर्ता इस बात पर सहमत हैं कि खेती की शुरुआत के बाद इंसानों का कद घटा था.

साल 2022 में हुए एक अध्ययन से पता चला कि अगर जीन में मौजूद अंतर के असर को हटा दिया जाए, तो नवपाषाण युग के लोगों का औसत कद उनसे पहले रहने वाले लोगों के मुक़ाबले 2.8 सेंटीमीटर छोटा था.

खेती शुरू होने से भोजन का अधिक स्थायी इंतज़ाम तो हो गया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि लोगों को पहले से बेहतर खाना मिलने लगा था.

शिकार करके और जंगलों से भोजन जुटाकर रहने वाले लोगों के खानपान में पशुओं से मिलने वाली चीज़ें ज़्यादा शामिल थीं.

लोगों की लंबाई कभी बढ़ी और कभी घटी

ब्लम कहते हैं कि यही बात सबसे अहम है.

उनके मुताबिक़, "यह बात भूखा या पेट भरा होने से जुड़ी है. इस लिहाज़ से पशुओं से मिलने वाला भोजन अच्छा था, क्योंकि उसमें पाए जाने वाले अमीनो एसिड शरीर के लिए वास्तव में ज़रूरी होते हैं."

बेहतर खानपान के अलावा शिकार करके और भोजन जुटाकर रहने वाले लोग एक जगह से दूसरी जगह जा सकते थे. वे अपना कचरा पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाते थे.

लेकिन खेती करने वाले लोगों के लिए ऐसा करना संभव नहीं था.

वे संक्रामक बीमारियों से जूझते थे. उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ती थी, अपने घरों और पशुओं की देखभाल करनी होती थी और जानवरों के साथ ही रहना पड़ता था.

ब्लम के मुताबिक़, इसके बाद के हज़ारों वर्षों में अलग-अलग इलाक़ों में लोगों का कद कभी बढ़ा और कभी घटा. लेकिन अक्सर ये बदलाव लंबे समय तक नहीं टिके.

वह कहते हैं, "लंबे समय तक कद के लगातार बढ़ने या घटने का कोई साफ़ रुझान दिखाई नहीं देता. अकाल आते हैं, युद्ध होते हैं, लेकिन उनके बाद आबादी फिर संभल जाती है."

कुछ संकटों के ऐसे नतीजे भी सामने आए, जिनकी उम्मीद नहीं थी.

14वीं सदी के मध्य में यूरोप में प्लेग की महामारी फैली थी, जिसे 'ब्लैक डेथ' कहा जाता है. इसमें यूरोप की आधी आबादी तक के मारे जाने का अनुमान है.

लेकिन इस महामारी के बाद के लोगों के कद का अनुमान बताता है कि उनकी औसत लंबाई बढ़ी थी.

डॉ. गुंटुपल्ली और उनके साथियों ने इंग्लैंड में मिले कंकालों पर एक अध्ययन किया.

इससे पता चला कि 14वीं सदी की शुरुआत में लोगों का औसत कद लगभग 170 सेंटीमीटर था. 15वीं सदी की शुरुआत तक यह बढ़कर लगभग 174 सेंटीमीटर हो गया था.

गुंटुपल्ली कहती हैं कि इस बारे में बहुत ज़्यादा आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं.

फिर भी उनका अनुमान है कि कद बढ़ने की एक वजह मज़दूरी बढ़ना हो सकती है.

काम करने वाले लोगों की कमी हो गई थी. इससे मज़दूरों की मोलभाव करने की ताक़त बढ़ी होगी और शायद उनके जीवन स्तर में भी सुधार हुआ होगा.

'कई बदलावों ने मिलकर असर डाला'

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ब्लम के मुताबिक़, इंसानों की लंबाई में दूसरा बड़ा बदलाव औद्योगिक क्रांति के साथ आया.

औद्योगिक क्रांति की शुरुआत 18वीं सदी में ब्रिटेन से हुई और इसके बाद यह दुनिया के दूसरे हिस्सों में फैल गई.

औद्योगीकरण के दौरान अर्थव्यवस्थाएं खेती से उद्योगों की ओर बढ़ीं. बड़े पैमाने पर शहर बसे, नई तकनीकें लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा बनीं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नेटवर्क का विस्तार हुआ.

इन बदलावों से लोगों की लंबाई बढ़ी, लेकिन ऐसा तुरंत नहीं हुआ.

गुंटुपल्ली कहती हैं कि औद्योगिक क्रांति के शुरुआती दौर का माहौल "सेहत के लिए अच्छा नहीं था."

साफ़-सफ़ाई की ख़राब व्यवस्था, तंग घरों और कारख़ानों में बहुत कठिन काम के कारण शुरुआती दशकों में अलग-अलग देशों के लोगों की लंबाई घट गई.

उनके मुताबिक़, बड़े औद्योगिक शहरों में हालात ऐसे थे कि लोग एक ही बिस्तर पर बारी-बारी से अलग-अलग शिफ़्ट में सोते थे.

लोगों की आमदनी बढ़ने और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े क़दम उठाए जाने के बाद ही उनके कद में साफ़ बढ़ोतरी दिखाई दी.

ब्लम इसे साफ़-सफ़ाई, रहने की जगह और भोजन में सुधार के साथ-साथ इलाज की नई तकनीकों के आविष्कार का नतीजा मानते हैं.

वह कहते हैं, "यह कई बदलावों का एक बड़ा समूह था, जिन्होंने मिलकर असर डाला."

दक्षिण कोरिया में औद्योगीकरण देर से शुरू हुआ. लेकिन साल 2016 के विश्लेषण के मुताबिक़, देश के तेज़ आर्थिक विकास के साथ पिछली एक सदी के दौरान लोगों की औसत लंबाई में सबसे तेज़ बढ़ोतरी में से एक दर्ज की गई.

दक्षिण कोरिया के पुरुषों का औसत कद 15 सेंटीमीटर और महिलाओं का 20 सेंटीमीटर बढ़ा.

क्या इंसानों का कद अपनी सबसे ऊंची सीमा तक पहुंच गया है?

'आवर वर्ल्ड इन डेटा' के मुताबिक़, साल 1996 में पैदा हुए पुरुषों का दुनिया भर में औसत कद 171 सेंटीमीटर और महिलाओं का औसत कद 159 सेंटीमीटर है.

ब्लम कहते हैं कि आज बहुत विकसित देशों में आमदनी, कामकाज की क्षमता, वस्तुओं और सेवाओं में होने वाली बढ़ोतरी से लोगों का औसत कद और बढ़ता दिखाई नहीं दे रहा है.

ऐसा क्यों हो रहा है, इसकी वजह साफ़ नहीं है.

कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि इन देशों के लोग शायद उस अधिकतम कद तक पहुंच चुके हैं, जो उनके जीन तय करते हैं.

इसके पीछे फ़ास्ट फ़ूड की बढ़ती खपत और कम शारीरिक गतिविधियों वाली जीवनशैली भी एक वजह हो सकती है.

ब्लम का मानना है कि आने वाले समय में लोगों के "जैविक जीवन स्तर" को समझने के लिए कद के अलावा कुछ नए पैमानों की ज़रूरत पड़ सकती है.

मिसाल के लिए, वह कहते हैं कि वीगन और शाकाहारी खाना खाने का चलन बढ़ने से लोगों का औसत कद बढ़े, यह ज़रूरी नहीं है.

लेकिन इसके दूसरे फ़ायदे हो सकते हैं. ऐसा खाना सेहत के लिए बेहतर हो सकता है या पर्यावरण के लिहाज़ से अधिक टिकाऊ हो सकता है.

जिन देशों में ग़रीबी वहां कद छोटे!

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वहीं, पूरी दुनिया की तस्वीर को देखते हुए डॉ. अरविंदा गुंटुपल्ली को संदेह है कि इंसानों का कद आगे भी लगातार बढ़ता रहेगा.

वह भोजन और ईंधन की कमी के साथ-साथ आज की "बेहद गंभीर असमानताओं" की ओर ध्यान दिलाती हैं.

उनका कहना है कि कम और मध्यम आय वाले देशों में कुपोषण के कारण बच्चों का कद उम्र के हिसाब से छोटा रह जाने के मामले ज़्यादा हैं.

इन देशों में सबसे ग़रीब लोगों का कद सबसे छोटा है.

यहां कद छोटा रह जाने का मतलब है कि बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से बहुत छोटे होते हैं. इसका असर बड़े होने के बाद भी उनकी लंबाई पर पड़ता है.

गुंटुपल्ली के मुताबिक़, सूखा और बाढ़ जैसी मौसम की गंभीर घटनाएं भोजन के उत्पादन और दूध व पशुओं से मिलने वाले दूसरे खाद्य पदार्थों की उपलब्धता को भी प्रभावित करती हैं.

वह कहती हैं, "दुनिया भर में स्वास्थ्य पर ख़र्च होने वाला बजट भी कम हो रहा है. इसका असर टीकाकरण, पोषण और शरणार्थियों के लिए चलाए जा रहे कई कार्यक्रमों पर पड़ रहा है."

गुंटुपल्ली का मानना है कि इन सभी हालात के एक साथ आने से कद से जुड़ी असमानता बढ़ेगी.

यह असमानता केवल अमीर और ग़रीब देशों के बीच ही नहीं, बल्कि एक ही समाज के लोगों के बीच भी बढ़ेगी.

वह कहती हैं, "हम एक असमान दुनिया में रहते हैं."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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Source: BBC Hindi · कैथरीन हीटवुड

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