अखिलेश यादव (बाएं) और योगी आदित्यनाथ (दाएं)

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    • Author, प्रेरणा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित 2 मिनट पहले

  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

'समाजवादी पार्टी (सपा) का खाता वहां भी खुल गया, जहां नहीं खुलना चाहिए था.''

उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 11 सीटों पर हुए चुनाव के नतीजों पर यह प्रतिक्रिया राज्य के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने दी है.

मौर्य ने माना कि भारतीय जनता पार्टी को उम्मीद थी कि वह पिछली बार से ज़्यादा सीटें जीतेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. उन्होंने कहा कि पार्टी नतीजों की समीक्षा करेगी और 2027 के विधानसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने की कोशिश करेगी.

दूसरी तरफ़, सोशल मीडिया पर समाजवादी पार्टी के समर्थकों के हवाले से यह नारा भी चर्चा में है - ''अयोध्या, वाराणसी, प्रयागराज तो झांकी है, पूरा यूपी बाकी है.''

दरअसल, उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की जिन 11 सीटों पर बीते 23 अक्तूबर को मतदान हुआ, उनमें छह सीटों पर बीजेपी और पांच पर समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की है.

सीटों की संख्या के लिहाज़ से बीजेपी आगे रही, लेकिन लखनऊ की स्नातक सीट पर हार, आगरा की शिक्षक सीट पर सपा की जीत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की दोनों सीटों पर सपा के कब्ज़े ने इन नतीजों को राजनीतिक रूप से अहम बना दिया है.

किस पार्टी ने किस सीट पर दर्ज की जीत?

विधान परिषद की 11 सीटों में पांच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों से जुड़ी थीं.

ये सीटें थीं- लखनऊ स्नातक, लखनऊ शिक्षक, आगरा स्नातक, आगरा-अलीगढ़ शिक्षक, मेरठ स्नातक, मेरठ शिक्षक, बरेली-मुरादाबाद शिक्षक, गोरखपुर-फ़ैज़ाबाद शिक्षक, इलाहाबाद-झांसी स्नातक, वाराणसी स्नातक और वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र.

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समाप्त

2020 में इन 11 सीटों के चुनाव में बीजेपी ने छह, समाजवादी पार्टी ने तीन और निर्दलीय उम्मीदवारों ने दो सीटों पर जीत दर्ज की थी. वहीं, इस बार बीजेपी की कुल सीटें तो छह ही रहीं, लेकिन सपा तीन से बढ़कर पांच सीटों पर पहुंच गई.

समाजवादी पार्टी ने लखनऊ स्नातक, आगरा-अलीगढ़ शिक्षक, वाराणसी स्नातक, वाराणसी शिक्षक और इलाहाबाद-झांसी स्नातक सीट पर जीत दर्ज की है.

वहीं, बीजेपी ने लखनऊ शिक्षक, आगरा स्नातक, मेरठ स्नातक, मेरठ शिक्षक, बरेली-मुरादाबाद शिक्षक और गोरखपुर-फ़ैज़ाबाद शिक्षक सीट अपने नाम की हैं.

इन नतीजों में कुछ सीटें ऐसी हैं, जिनकी राजनीतिक अहमियत ज़्यादा है.

प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में दोनों सीटों पर सपा की जीत

लाल बिहारी यादव

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इमेज कैप्शन, वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में सपा के लाल बिहारी यादव ने जीत दर्ज की

जैसे- वाराणसी की दोनों ही सीटें. इन दोनों सीटों, शिक्षक और स्नातक, पर समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की है. ये जीत इसलिए अहम है क्योंकि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है.

वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में सपा के लाल बिहारी यादव ने बीजेपी के डॉ. प्रमोद मिश्रा को हराया है. लाल बिहारी यादव ने 11,612 वोट हासिल किए और इस सीट पर अपना कब्ज़ा बरकरार रखा.

वह इससे पहले उत्तर प्रदेश विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष भी रह चुके हैं.

वहीं, वाराणसी खंड स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में सपा के आशुतोष सिन्हा ने बीजेपी के केदारनाथ सिंह को हराया है. यह सीट भी पहले सपा के हिस्से में ही थी.

वाराणसी स्नातक सीट पर मतगणना भी दिलचस्प रही. मतों की गिनती के दौरान बीजेपी की ओर से आपत्तियां उठाई गईं और पुनर्गणना की मांग की गई. हंगामे के बीच मतगणना कुछ समय के लिए प्रभावित हुई, लेकिन प्रक्रिया आगे बढ़ने के साथ आशुतोष सिन्हा की बढ़त बरकरार रही और उनकी जीत सुनिश्चित हो गई.

आगरा सीट क्यों अहम?

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इमेज कैप्शन, समाजवादी पार्टी के डॉ. आकाश अग्रवाल ने बीजेपी के हरि किशोर तिवारी को हराया है

आगरा-अलीगढ़ शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में समाजवादी पार्टी के डॉ. आकाश अग्रवाल ने बीजेपी के हरि किशोर तिवारी को 4,263 वोटों से हराया है. आकाश अग्रवाल को 14,046 वोट मिले, जबकि बीजेपी उम्मीदवार को 9,783 वोट हासिल हुए.

आकाश अग्रवाल की जीत कई मायनों में अहम है. 2020 में उन्होंने इस सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था और जीत दर्ज की थी. इस बार वह समाजवादी पार्टी के टिकट पर मैदान में उतरे और अपनी सीट बरकरार रखने में कामयाब रहे.

मतदान के दौरान आगरा में बूथ कैप्चरिंग और अनियमितताओं की शिकायतें आई थीं.

आकाश अग्रवाल ने प्रशासन पर पक्षपात के आरोप लगाए थे. कुछ बूथों पर दोबारा मतदान भी कराया गया. इन शिकायतों और पुनर्मतदान की वजह से यह सीट चुनाव के दौरान चर्चा में रही.

लखनऊ: बीजेपी की स्नातक सीट सपा ने छीनी

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लखनऊ की स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की सीट पर समाजवादी पार्टी की कांति सिंह ने बीजेपी के मौजूदा एमएलसी अवनीश कुमार सिंह को 17,127 वोटों से हराया. कांति सिंह को 56,905 वोट मिले, जबकि अवनीश कुमार सिंह को 39,778 वोट हासिल हुए.

कांति सिंह 2014 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीतकर विधान परिषद पहुंची थीं. 2020 के चुनाव में बीजेपी के अवनीश कुमार सिंह ने उन्हें हराकर यह सीट अपने नाम कर ली थी. इस बार कांति सिंह सपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरीं और छह साल बाद सीट वापस हासिल कर ली.

यह नतीजा इसलिए अहम है क्योंकि बीजेपी को यहां अपने मौजूदा एमएलसी की सीट गंवानी पड़ी. कांति सिंह की जीत ने सपा को एक ऐसी सीट पर वापसी का मौका दिया, जिस पर पिछली बार बीजेपी ने कब्ज़ा किया था.

हालांकि, लखनऊ की शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की सीट बीजेपी ने बरकरार रखी. यहां पार्टी के उमेश द्विवेदी ने जीत की हैट्रिक लगाई. उन्हें 13,179 वोट मिले, जबकि सपा के सुशील कुमार को 8,371 वोट हासिल हुए.

इस तरह लखनऊ में दोनों सीटों के नतीजे अलग-अलग रहे.

गोरखपुर में बीजेपी की जीत, पर अंतर बहुत कम

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गोरखपुर-फ़ैज़ाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में बीजेपी के ध्रुव कुमार त्रिपाठी ने जीत तो दर्ज की, लेकिन निर्दलीय उम्मीदवार राजीव यादव ने उन्हें कड़ी टक्कर दी.

ध्रुव त्रिपाठी महज़ 307 वोटों से जीते, जबकि समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार डॉ. संजयन त्रिपाठी तीसरे स्थान पर रहे.

इस मुकाबले की एक दिलचस्प बात यह भी थी कि ध्रुव त्रिपाठी इससे पहले तीन बार निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीत चुके थे, लेकिन इस बार बीजेपी के टिकट पर मैदान में उतरे थे.

उनके सामने निर्दलीय राजीव यादव की चुनौती थी, जबकि सपा ने डॉ. संजयन त्रिपाठी को उम्मीदवार बनाया था. नतीजों में राजीव यादव दूसरे स्थान पर रहे. मतगणना के बाद उन्होंने वोटों की गिनती में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए अदालत जाने की बात कही. सपा उम्मीदवार ने भी मतगणना पर सवाल उठाए.

गोरखपुर-फ़ैज़ाबाद सीट पर बीजेपी की जीत के बावजूद मुकाबले का इतना करीबी होना ध्यान खींचता है.

क्या कह रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार?

इन नतीजों के मायने समझने के लिए हमने प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार आनंद राय से बात की. आनंद राय इस जीत को सपा के लिए एक उपलब्धि के तौर पर देखते हैं.

उन्होंने कहा, ''अगर बीजेपी एकतरफा जीत हासिल करती तो उसे यह कहने का मौका रहता कि इन नतीजों पर यूजीसी के मुद्दे से लेकर पेपर लीक और जेन-ज़ी आंदोलन का कोई असर नहीं पड़ा, लेकिन चुनाव नतीजों ने पढ़े-लिखे और शिक्षक तबके में सपा को बढ़त दिलाई है. जाहिर है कि इससे सपा कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा. चूंकि 2027 के यूपी विधानसभा चुनावों को लेकर सभी राजनीतिक दल अपनी अंतिम तैयारी में हैं, ऐसे में एमएलसी चुनाव का परिणाम सपा के लिए शक्तिवर्धक के रूप में काम करेगा.''

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वहीं, वाराणसी की दोनों सीटों पर बीजेपी की हार पर वह कहते हैं, ''वाराणसी में 2024 के लोकसभा चुनाव का परिणाम भले पीएम के पक्ष में रहा, लेकिन लड़ाई बहुत दिलचस्प रही. इस स्थिति में भारतीय जनता पार्टी के लिए प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए विशेष तैयारी की ज़रूरत थी, लेकिन वहां दोनों सीटों पर सपा ने अपना प्रभाव बरकरार रखा."

"इससे सपा को अपने पक्ष में यह माहौल बनाने का मौका मिल गया है कि 2024 में यूपी में मिले बहुमत को वह अपने पक्ष में बरकरार रखेगी. सपा के शीर्ष नेताओं ने यह दावा भी शुरू कर दिया है. गोरखपुर में भी बीजेपी उम्मीदवार को बहुत मुश्किल से जीत मिली. ऐसे में पीएम और सीएम के क्षेत्रों में आए नतीजों ने बीजेपी को एक सबक दिया है. बीजेपी को एक नए सिरे से आत्ममंथन की ज़रूरत है.''

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में अपने लेख में वरिष्ठ पत्रकार पंकज शाह ने उत्तर प्रदेश के एमएलसी चुनाव को बीजेपी और समाजवादी पार्टी, दोनों के लिए 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक 'लिटमस टेस्ट' बताया है.

इस लेख में वह सेंटर फ़ॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड पॉलिटिक्स के निदेशक और राजनीतिक विश्लेषक डॉ. ए.के. वर्मा के हवाले से लिखते हैं कि दोनों पार्टियों ने इन चुनावों के ज़रिए अपनी राजनीतिक ताक़त दिखाने की कोशिश की, ख़ासकर ऐसे समय में जब वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर विवाद चल रहा है.

डॉ. वर्मा के विश्लेषण के मुताबिक़, एमएलसी चुनावों और विधानसभा चुनावों का मिज़ाज अलग होता है. विधानसभा चुनाव में जातीय समीकरण, सरकारी योजनाएं, नेताओं की लोकप्रियता और बड़े राजनीतिक मुद्दे मतदाताओं के फ़ैसले पर असर डालते हैं. वहीं, एमएलसी चुनावों में उम्मीदवार का लोगों से व्यक्तिगत संपर्क, शिक्षक और स्नातक जैसे मतदाता समूहों के बीच उसकी पकड़, स्थानीय नेटवर्क और उसकी अपनी साख ज़्यादा मायने रखती है. इसलिए इन नतीजों को सीधे विधानसभा चुनाव का संकेत मानने के बजाय, पार्टियों की स्थानीय पकड़ और संगठन की ताक़त को समझने के एक मौक़े के तौर पर देखना चाहिए.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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Source: BBC Hindi · प्रेरणा

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