कुछ लोगों के लिए सिर्फ़ चार घंटे की नींद ही क्यों काफ़ी होती है?
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- Author, अमांडा रुग्गेरी
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
प्रकाशित 3 मिनट पहले
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कुछ लोग सच में बहुत कम सोकर भी बिल्कुल ठीक रहते हैं. लेकिन यह पता लगाना आसान नहीं है कि आप भी उन्हीं लोगों में से एक हैं या सिर्फ़ आपको ऐसा लगता है.
एमी प्यू बर्नार्ड को जहां तक याद है, उन्हें कभी बहुत ज़्यादा नींद की ज़रूरत नहीं पड़ी. आज भी वह आमतौर पर रात करीब 10 बजे सो जाती हैं और सुबह साढ़े चार बजे उठ जाती हैं.
वह कहती हैं, "मेरी नींद पूरी तरह खुल जाती है. फिर मैं बिस्तर में पड़ी नहीं रह सकती." बिस्तर पर पहुंचने के बाद उन्हें कभी-कभी तुरंत नींद नहीं आती. ऐसे में वह केवल पांच घंटे ही सो पाती हैं.
इसके बावजूद अगली सुबह वह थकी हुई नहीं, बल्कि ऊर्जा से भरी होती हैं. बर्नार्ड अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोलोराडो में इम्यूनोलॉजी की प्रोफ़ेसर हैं. सुबह उठकर वह अपने कुत्ते को घुमाने ले जाती हैं. फिर एक घंटे तक जिम में कसरत करती हैं. इतना ही नहीं, सुबह आठ बजे से पहले वह डेढ़ घंटे काम भी कर चुकी होती हैं.
उनके दोस्त यह देखकर हैरान होते हैं कि इतनी कम नींद में वह इतना कुछ कैसे कर लेती हैं. लेकिन बर्नार्ड के परिवार में यह कोई हैरानी की बात नहीं है. उनके पिता और भाई भी उन्हीं की तरह बहुत कम सोते हैं.
हममें से ज़्यादातर लोगों के साथ ऐसा नहीं है. अमेरिका के नेशनल स्लीप फ़ाउंडेशन ने नींद पर उपलब्ध जानकारियों की ताज़ा समीक्षा की है. इसके मुताबिक़, 26 से 64 साल की उम्र के एक आम वयस्क को हर 24 घंटे में करीब सात से नौ घंटे की नींद की ज़रूरत होती है.
फिर कुछ लोगों को दूसरों से बहुत कम नींद क्यों चाहिए?
यह लंबे समय से वैज्ञानिकों के लिए एक रहस्य रहा है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उन्हें कई ऐसे सुराग मिले हैं, जिनसे पता चलता है कि इसमें हमारे जीन की बड़ी भूमिका हो सकती है.
कुछ लोगों में बर्नार्ड की तरह बेहद दुर्लभ आनुवंशिक बदलाव होते हैं. वहीं, जीन में होने वाले सैकड़ों आम बदलाव भी हमारी नींद की अवधि पर असर डाल सकते हैं.
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इन्हीं खोजों से यह समझने में मदद मिल रही है कि कुछ लोग बहुत कम सोकर भी कैसे ठीक रहते हैं.
भविष्य में इस जानकारी का इस्तेमाल उन लोगों को कम नींद के आम नुक़सानों से बचाने के लिए भी किया जा सकता है, जिन्हें किसी वजह से पूरी नींद नहीं मिल पाती.
बर्नार्ड को मिला अपनी कम नींद का जवाब
साल 2019 में बर्नार्ड को पहली बार पता चला कि उन्हें इतनी कम नींद की ज़रूरत क्यों पड़ती है. अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, सैन फ़्रांसिस्को के शोधकर्ताओं ने उस समय जीन में होने वाले एक ऐसे बदलाव की पहचान की थी, जिसका संबंध इंसानों की नींद की अवधि से है.
यह बदलाव जिन लोगों में पाया गया, वे आमतौर पर सोने के समय पर ही बिस्तर पर जाते थे, लेकिन उनकी नींद बहुत जल्दी खुल जाती थी.
ऐसे लोग आमतौर पर रात में चार से साढ़े छह घंटे तक ही सोते थे. बर्नार्ड ने शोधकर्ताओं की टीम को अपने ख़ून का नमूना भेजा. जांच में पता चला कि उनके जीन में भी वही बदलाव मौजूद है.
परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली इस दुर्लभ स्थिति को "फ़ैमिलियल नेचुरल शॉर्ट स्लीप" यानी एफएनएसएस कहा जाता है.
इस स्थिति वाले लोगों को स्वाभाविक रूप से बहुत कम नींद की ज़रूरत होती है. उनके परिवार के दूसरे सदस्यों में भी यह स्थिति हो सकती है.
इसके बाद के वर्षों में वैज्ञानिकों ने एफएनएसएस से जुड़े जीन में होने वाले कुछ और बदलावों की भी पहचान की.
कम सोकर भी ये लोग ठीक कैसे रहते हैं?
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इस रिसर्च का नेतृत्व करने वाली आणविक जीवविज्ञानी यिंग हुई फ़ू कहती हैं कि एफएनएसएस से जुड़ा सबसे बड़ा रहस्य यही है कि इतनी कम नींद लेने के बावजूद ये लोग ठीक कैसे रहते हैं. वैज्ञानिक अभी इसका पूरा जवाब तलाश रहे हैं.
कुछ दिलचस्प सबूत बताते हैं कि एफएनएसएस से जुड़े जीन में होने वाले बदलाव न सिर्फ़ नींद की ज़रूरत कम करते हैं, बल्कि हो सकता है कि ये लोगों को कम नींद के नुक़सानों से भी बचाते हों.
इन नुक़सानों में याददाश्त कमज़ोर होना भी शामिल है. साल 2019 में फ़ू के नेतृत्व में चूहों पर एक प्रयोग किया गया. शोधकर्ताओं ने चूहों के जीन में एफएनएसएस से जुड़ा एक बदलाव किया.
उन्होंने पाया कि ये चूहे न सिर्फ़ कम सो रहे थे, बल्कि कम नींद का उनकी याददाश्त पर भी कोई ख़ास नुक़सान नहीं दिखा.
एक अन्य जांच में पाया गया कि इनमें से कुछ आनुवंशिक बदलावों वाले चूहों में अल्ज़ाइमर जैसी बीमारी होने की आशंका भी कम थी.
जुड़वा भाइयों की नींद में क्या अंतर मिला?
साल 2014 में अलग-अलग देशों के शोधकर्ताओं की एक टीम ने दो जुड़वा भाइयों की जांच की. ये एक जैसे दिखने वाले जुड़वा भाई नहीं थे.
एक भाई के जीन में कम नींद से जुड़ा बदलाव था, जबकि दूसरे के जीन में ऐसा कोई बदलाव नहीं था.
शोधकर्ताओं ने पाया कि जीन में बदलाव वाला भाई नियमित रूप से अपने दूसरे भाई के मुक़ाबले करीब एक घंटा कम सोता था. इसके बाद दोनों भाइयों को लगातार 38 घंटे तक जगाए रखा गया.
इस दौरान उनकी काम करने की क्षमता की जांच की गई. जीन में बदलाव वाले भाई ने दूसरे भाई के मुक़ाबले करीब 40 फ़ीसदी कम ग़लतियां कीं.
दोनों भाइयों की नींद के तरीक़े में भी कुछ दिलचस्प अंतर देखने को मिले. जीन में बदलाव वाला भाई कम समय तक सोता था. इसके बावजूद उसे अपने भाई के लगभग बराबर नॉन-आरईएम नींद मिलती थी.
नॉन-आरईएम नींद में धीमी तरंगों वाली गहरी नींद भी शामिल होती है.
इसका मतलब यह हो सकता है कि कम समय तक सोने के बावजूद उसे नींद से कुछ मामलों में ज़्यादा फ़ायदा मिल रहा था.
क्या ऐसी दवा बन सकती है, जिससे कम नींद की ज़रूरत पड़े?
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फ़ू कहती हैं कि इस पर रिसर्च अभी जारी है और इसे बहुत सावधानी से आगे बढ़ाना ज़रूरी है.
पिछले कुछ वर्षों में यह जानने की कोशिश तेज़ हुई है कि जीन में होने वाले इन बदलावों से मिली जानकारी का इस्तेमाल लोगों की मदद के लिए कैसे किया जा सकता है.
दवा बनाने वाली कंपनियों को उम्मीद है कि कम सोने वाले लोगों पर हुई खोजों के आधार पर एक दिन नींद से जुड़ी बीमारियों के इलाज के लिए दवाएं बनाई जा सकेंगी.
इस जानकारी का इस्तेमाल सैनिकों को कम नींद में काम करने में मदद देने के लिए भी किया जा सकता है.
लेकिन इससे पहले वैज्ञानिकों को यह साफ़ तौर पर समझना होगा कि जीन में होने वाले ये बदलाव कम सोने वाले लोगों को नुक़सान से बचाते हैं या नहीं.
अगर ये उन्हें बचाते हैं, तो यह भी समझना होगा कि ऐसा कैसे होता है.
इस जानकारी के बिना ऐसी दवा बन सकती है, जिसके ऐसे नुक़सान सामने आएं जिनका पहले अंदाज़ा न लगाया गया हो.
फ़ू कहती हैं, "आपको समझना होगा कि यह काम कैसे करता है. आप ऐसा नहीं चाहेंगे कि आप कम सोने लगें और फिर पांच, 10 या 20 साल बाद आपको अल्ज़ाइमर, पार्किंसंस या कैंसर हो जाए."
हमारी नींद पर जीन का कितना असर होता है?
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एफएनएसएस से जुड़े जीन में होने वाले बदलाव कम नींद का एक बेहद अलग और दिलचस्प उदाहरण हैं.
लेकिन केवल यही बदलाव यह तय नहीं करते कि हम कितनी देर सोते हैं.
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अलग-अलग लोगों की नींद की अवधि में 30 से 65 फ़ीसदी तक का अंतर उनके जीन के कारण हो सकता है.
यानी लोगों की नींद की अवधि में होने वाले अंतर का 65 फ़ीसदी तक हिस्सा उनके जीन से समझाया जा सकता है.
अब तक जीन के पूरे ढांचे में ऐसी कई सौ जगहों की पहचान की गई है, जो हमारी नींद की अवधि पर असर डाल सकती हैं.
करीब छह लाख 50 हज़ार वयस्कों के आंकड़ों के विश्लेषण में ऐसी करीब 244 जगहें मिली हैं.
यह रिसर्च अभी प्रकाशित नहीं हुई है. इसे फ़िलहाल प्रकाशन से पहले के शुरुआती रूप में जारी किया गया है.
इस रिसर्च की मुख्य लेखिका और किंग्स कॉलेज लंदन में जीन पर रिसर्च करने वाली इसाबेल ऑस्टिन ज़िमरमैन कहती हैं कि इनमें से किसी एक आम बदलाव से नींद की अवधि में केवल करीब एक मिनट का अंतर आता है.
लेकिन जब ऐसे कई बदलाव एक साथ होते हैं, तो उनका कुल असर बढ़ जाता है.
ऑस्टिन ज़िमरमैन के मुताबिक़, आम लोगों की नींद की अवधि में करीब 20 मिनट का अंतर जीन में होने वाले इन बदलावों से जुड़ा हो सकता है.
हालांकि, अभी इस बारे में बहुत कम रिसर्च हुई है कि इनमें से कौन से आम बदलाव लोगों को कम नींद के नुक़सान से बचा सकते हैं.
बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं पर हुई रिसर्च
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में प्रसव और महिला रोगों की डॉक्टर और रिसर्चर कियारा पेट्रोसेलिनी ने हाल ही में इससे जुड़ी एक रिसर्च का नेतृत्व किया.
उनकी टीम ने बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित 343 महिलाओं के जीन की जांच की. इन सभी महिलाओं ने बच्चे को जन्म दिया था.
शोधकर्ताओं ने जीन में मौजूद बदलावों के आधार पर यह अंदाज़ा लगाया कि इनमें से किन महिलाओं में स्वाभाविक रूप से कम नींद की ज़रूरत होने की संभावना ज़्यादा है.
जिन महिलाओं में कम सोने की संभावना सबसे ज़्यादा थी, उनमें बच्चे के जन्म के बाद पोस्टपार्टम साइकोसिस होने का ख़तरा आधा था.
पोस्टपार्टम साइकोसिस बच्चे के जन्म के बाद होने वाली एक गंभीर मानसिक समस्या है.
इसकी तुलना उन महिलाओं से की गई, जिनमें स्वाभाविक रूप से कम सोने की संभावना सबसे कम थी.
नींद न आने की समस्या के मामले में भी ऐसा ही रुझान देखने को मिला.
हालांकि, इन नतीजों को समझने के लिए अभी और रिसर्च की ज़रूरत है.
शोधकर्ताओं का कहना है कि हो सकता है कि इन महिलाओं में जीवन के शुरुआती दौर से ही नींद टूटने और कम सोने को सहन करने की क्षमता विकसित हो गई हो.
इस वजह से बच्चे के जन्म के बाद नींद टूटने का उनके मूड पर असर कम हो सकता है.
कम नींद से जुड़े जीन हमेशा फ़ायदेमंद नहीं होते
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लेकिन जीन की वजह से कम नींद की ज़रूरत होना हमेशा सेहत के लिए अच्छा नहीं होता.
ऑस्टिन ज़िमरमैन और उनकी टीम ने एक बड़ी आबादी पर भी रिसर्च की. यह रिसर्च ख़ासतौर पर बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित माताओं पर नहीं की गई थी.
इसमें पाया गया कि आम तौर पर कम नींद से जुड़े जीन में बदलाव का संबंध नींद न आने और थकान महसूस होने की आशंका बढ़ने से था.
इन बदलावों का संबंध कई मानसिक और शारीरिक समस्याओं से भी पाया गया.
इनमें एडीएचडी, डिप्रेशन के लक्षण और टाइप 2 डायबिटीज़ शामिल हैं.
इसका यह मतलब ज़रूरी नहीं है कि कम सोने या कम नींद से जुड़े जीन की वजह से ये बीमारियां होती हैं.
लेकिन इससे यह ज़रूर पता चलता है कि कम नींद से जुड़े जीन हमेशा लोगों को इन ख़तरों से नहीं बचाते.
कम नींद में ठीक महसूस होना हमेशा सही नहीं
इस कहानी को एक और बात मुश्किल बनाती है. जो लोग कम सोने के बावजूद ख़ुद को पूरी तरह ठीक समझते हैं, वे हमेशा अपनी हालत का सही अंदाज़ा नहीं लगा पाते.
एक रिसर्च में स्वस्थ वयस्कों को हर रात बिस्तर पर केवल चार या छह घंटे बिताने की अनुमति दी गई.
इसके बाद उनकी सोचने, समझने और काम करने की क्षमता की अलग-अलग जांच की गई. समय के साथ इन जांचों में उनका प्रदर्शन लगातार ख़राब होता गया.
लेकिन दो हफ़्ते बाद भी इन लोगों ने कहा कि उन्हें केवल "थोड़ी सी" नींद की कमी महसूस हो रही है.
इस रिसर्च में शामिल वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के स्लीप एंड परफ़ॉर्मेंस रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिक हांस वैन डोंगेन कहते हैं कि समय के साथ व्यक्ति की काम करने की क्षमता लगातार कम होती जाती है.
लेकिन इसके साथ ही अपनी क्षमता में आ रही इस गिरावट का अंदाज़ा लगा पाने की उसकी क्षमता भी कम हो जाती है.
यह भी सच है कि कुछ लोगों को दूसरों के मुक़ाबले कम नींद की ज़रूरत होती है.
वैन डोंगेन की एक दूसरी रिसर्च में भी पाया गया है कि कुछ लोग नींद की कमी को दूसरों की तुलना में बेहतर तरीक़े से सहन कर पाते हैं.
लेकिन लोगों के बीच इस अंतर को समझने के लिए केवल यह पूछना काफ़ी नहीं है कि कोई व्यक्ति कितने घंटे सोता है या अगले दिन कैसा महसूस करता है.
आगे इन खोजों से क्या फ़ायदा हो सकता है?
लंबे समय में ऑस्टिन ज़िमरमैन और फ़ू जैसे वैज्ञानिकों की खोजों से यह पहचानने में मदद मिल सकती है कि कौन से लोग सच में कम नींद में भी ठीक रहते हैं.
इससे उन लोगों की भी पहचान हो सकती है, जिन्हें लगता है कि वे कम नींद में ठीक हैं, लेकिन असल में उनकी काम करने की क्षमता पर असर पड़ रहा होता है.
भविष्य में इन खोजों की मदद से ऐसी दवाएं भी बनाई जा सकती हैं, जो कम सोने वाले लोगों को इसके नुक़सानों से बचने में मदद करें.
लेकिन फ़िलहाल ये खोजें लोगों को यह समझने में मदद कर सकती हैं कि उनके सोने का तरीक़ा दूसरों से अलग क्यों है. बर्नार्ड के साथ भी ऐसा ही हुआ.
जब उन्हें पता चला कि उनके जीन में एफएनएसएस से जुड़ा बदलाव मौजूद है, तो उनके मन से एक बोझ कम हो गया.
एक वैज्ञानिक होने के नाते वह पहले से जानती थीं कि लोगों में स्वाभाविक अंतर होते हैं और उनकी नींद भी एक जैसी नहीं होती.
उन्हें कम नींद की वजह से मिलने वाला अतिरिक्त समय भी हमेशा अच्छा लगता था.
ख़ासतौर पर तब, जब उनके पति और बच्चे गहरी नींद में सो रहे होते थे और वह अपने दिन का काम पहले ही शुरू कर सकती थीं.
फिर भी बर्नार्ड कई बार सोचती थीं कि कहीं उन्हें आराम करना ही तो नहीं आता.
उन्हें यह भी लगता था कि ज़्यादा न सो पाने की वजह कहीं यह तो नहीं कि वह एक साथ बहुत सारे काम संभाल रही हैं.
अब वह कहती हैं, "मुझे अपना जवाब मिल गया है."
"अब मैं जानती हूं कि जीन के कारण मैं ऐसी ही हूं और मुझे इसे स्वीकार करना होगा."
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Source: BBC Hindi · अमांडा रुग्गेरी
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