ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो पाकिस्तान बनने के कई साल बाद भी ख़ुद को भारतीय साबित करने की कोशिश क्यों कर रहे थे?

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो की एक तस्वीर (फ़ाइल फ़ोटो)

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    • Author, वक़ार मुस्तफ़ा
    • पदनाम, पत्रकार और शोधकर्ता
  • प्रकाशित 2 मिनट पहले

  • पढ़ने का समय: 12 मिनट

भारत की आज़ादी में अभी सात-आठ महीने बाक़ी थे. सिंध के एक बड़े ज़मींदार और राजनेता सर शाह नवाज़ भुट्टो अपनी पत्नी और बेटी के साथ जूनागढ़ रियासत में सरकार संभालने के लिए गए.

वे अपने छोटे बेटे ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को बंबई में पढ़ाई करने और ख़ानदान की बड़ी संपत्तियों की देखभाल करने के लिए छोड़ गए.

सितंबर 1947 में, जब ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो बंबई (अब मुंबई) छोड़कर उच्च शिक्षा के लिए विदेश चले गए, तब भारत सरकार ने उनकी संपत्तियों को 'इवैक्यूई' यानी मालिक के पाकिस्तान चले जाने के कारण छोड़ी गई संपत्ति घोषित कर दिया और अपने कब्ज़े में ले लिया.

इस ज़ायदाद को दोबारा हासिल करने के लिए भुट्टो ने अगले नौ वर्षों तक ख़ुद को 'भारत का नागरिक' बताते हुए भारत की अदालतों में क़ानूनी लड़ाई लड़ी.

भुट्टो की जायदाद

शिमला समझौते के दौरान ली गई पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो की एक तस्वीर (फ़ाइल फ़ोटो)

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स्टेनली वोलपार्ट ने ज़ुल्फ़िक़ार भुट्टो की आत्मकथा 'ज़ुल्फ़ी भुट्टो ऑफ़ पाकिस्तान: हिज़ लाइफ़ एंड टाइम्स' में लिखा है कि जब ज़ुल्फ़िक़ार भुट्टो के परिजन जूनागढ़ चले गए थे, तब वह बंबई के कारमाइकल रोड पर अपने घर 'द नेस्ट' में रहने लगे थे.

एडवोकेट संजय घोष ने वेबसाइट 'बार एंड बेंच' के लिए एक लेख में लिखा है कि बंबई के वर्ली एस्टेट में स्थित मकान नंबर 4ए को सर शाह नवाज़ भुट्टो ने बंबई के नगर निगम से स्थायी पट्टे पर लिया था.

इसके लिए 25,344 रुपये का भुगतान किया गया था.

वह 1946-47 में बंबई के व्यस्त फ़ोर्ट इलाक़े में एक अन्य पारिवारिक संपत्ति, बहुमंज़िला होटल एस्टोरिया से 110,000 रुपये से अधिक किराया हासिल करते थे. भुट्टो के पास कई वित्तीय गारंटी, क़ीमती सामान और नक़दी भी छोड़ी गई थी.

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एडवोकेट संजय घोष के मुताबिक़, सर शाह नवाज़ ने इन संपत्तियों को अपने 18 साल के बेटे के नाम पर ट्रांसफ़र किया था. सितंबर 1947 की शुरुआत में ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चले गए और नवंबर 1947 में सर शाह नवाज़ भुट्टो स्थायी रूप से कराची में बस गए.

एडवोकेट संजय ने अपने लेख में लिखा है कि इससे कुछ साल पहले कैथेड्रल और जॉन कॉनन स्कूल के 15 वर्षीय छात्र ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो ने पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना को लिखे एक पत्र में कहा था, "वह वक़्त आएगा, जब मैं पाकिस्तान के लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दूंगा."

स्टेनली लिखते हैं कि ज़ुल्फ़ी अक़्सर पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना का ज़िक्र अमेरिका में अपने दोस्तों से करते थे और कहते थे, "वो मेरे नेता हैं! वे मेरे आदर्श हैं, मैं उनका सम्मान करता हूं."

सितंबर 1948 की शुरुआत में जिन्ना की मौत के वक़्त ज़ुल्फ़ी ने वॉशिंगटन में पाकिस्तान के पहले राजदूत एमएएच इस्फ़हानी को लिखे एक पत्र में कहा, "हम इस अहम मोड़ पर अनाथ हो गए हैं, जब हमें अपने प्रिय नेता की अपार उदारता की पहले से कहीं अधिक ज़रूरत है."

उन्होंने गर्मी की छुट्टियों के दौरान कुछ समय के लिए वॉशिंगटन में पाकिस्तानी दूतावास में वॉलंटियर के रूप में काम भी किया.

भारत में नौ साल चली क़ानूनी लड़ाई

दूसरी ओर, 6 जुलाई 1949 को ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को भारत में "इवैक्यूई" घोषित किया गया था और उनकी ज़ायदाद को सरकार ने क़ब्ज़े में ले लिया था.

वकील और लेखक एजी नूरानी ने 'फ्रंटलाइन' पत्रिका के लिए एक लेख में लिखा था कि भुट्टो ने इस फ़ैसले को कस्टोडियन, कस्टोडियन जनरल, बॉम्बे और पंजाब उच्च न्यायालयों और आख़िर में भारत के सर्वोच्च न्यायालय में विभिन्न कार्रवाइयों के माध्यम से नौ साल तक चुनौती दी.

एजी नूरानी ने अपने लेख में लिखा है, "वह इस फ़ैसले का विरोध कर रहे थे कि उन्होंने अपनी ज़ायदाद छोड़ दी है या पाकिस्तान की नागरिकता ले ली है. "

एजी नूरानी के लेख के मुताबिक़, 19 नवंबर 1965 को राज्यसभा में पुनर्वास मामलों के तत्कालीन मंत्री महावीर त्यागी ने कहा था, "पाकिस्तान के विदेश मंत्री श्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो बंटवारे के वक़्त बंबई में अपने माता-पिता के साथ रह रहे थे और वहां उनकी ज़ायदाद थी."

सदन की कार्यवाही की आधिकारिक रिपोर्ट और महावीर त्यागी ने जो दस्तावेज़ सदन में पेश किए, उनके मुताबिक़ भुट्टो ने 27 जुलाई 1949 को इवैक्यूई प्रॉपर्टी के डिप्टी कस्टोडियन और 17 नवंबर 1951 को कस्टोडियन के सामने शपथ ली थी कि सीनियर कैम्ब्रिज परीक्षा पास करने के बाद वह 8 सितंबर 1947 को बंबई से अमेरिका रवाना हुए, जहां वे स्थायी निवासी थे.

उन्होंने अपनी याचिका में कहा कि 8 सितंबर 1947 को जब वह विदेश रवाना हुए, तो उनके पास भारतीय पासपोर्ट था.

27 जुलाई 1949 को उन्होंने शपथ लेते हुए यह भी कहा, "मैंने 1945 में विभिन्न विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए आवेदन करना शुरू किया. उनकी तरफ़ से जवाब मेरे पिता को मिलते थे. मेरी शिक्षा बंबई में हुई थी. मैं कराची में नहीं रहता."

लंबी चली क़ानूनी लड़ाई

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इमेज कैप्शन, 6 जुलाई 1949 को ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को भारत में "इवैक्यूई" घोषित किया गया था और उनकी ज़ायदाद को सरकार ने क़ब्ज़े में ले लिया था

30 जनवरी 1956 को भारत के कस्टोडियन जनरल के सामने अपनी अपील में उन्होंने कहा कि वह अस्थायी रूप से कराची में रह रहे हैं.

ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो का कहना था, "याचिकाकर्ता एक बालिग़ था, क़ानूनी रूप से अपने मामलों के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार था और केवल इसलिए कि उसके माता-पिता कराची में रहते थे और उसकी शादी वहीं हुई थी, यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता कि कराची उसका स्थायी घर था."

नूरानी ने अदालत के दस्तावेज़ों का हवाला देते हुए लिखा कि अपील में भुट्टो ने ख़ासतौर पर कहा, "माननीय कस्टोडियन यह समझने में नाकाम रहे कि याचिकाकर्ता भारत के नागरिक के रूप में भारतीय पासपोर्ट पर अमेरिका गया था और संबंधित समय पर भारत का नागरिक बना रहा. कस्टोडियन ने रिकॉर्ड पर किसी भी सबूत के बिना यह नतीजा निकालने में ग़लती की कि याचिकाकर्ता ने बालिग़ होने के बाद किसी प्रासंगिक समय पर कराची को अपने स्थायी घर के रूप में अपनाया था."

"11 सितंबर 1957 को उन्होंने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक अपील दायर की, जिसमें अनुरोध किया गया कि इवैक्यूई के रूप में उनके ख़िलाफ़ सभी कार्रवाइयों को अमान्य घोषित किया जाए."

एजी नूरानी के मुताबिक़, 1957 में ही भुट्टो संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य थे. संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक हर साल सितंबर में शुरू होती है.

अप्रैल 1958 में भुट्टो ने पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल के साथ जिनेवा में समुद्र के क़ानून पर सम्मेलन में पाकिस्तान के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया.

13 अगस्त 1958 को भुट्टो ने अपनी अपील वापस लेने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय में आवेदन किया और कहा कि याचिकाकर्ता अब कराची में स्थायी रूप से बस गया है और इस माननीय अदालत में लंबित अपील संख्या 489, वर्ष 1957 को आगे बढ़ाने का इरादा नहीं रखता है.

अदालत ने 3 नवंबर 1958 को अपील वापस लेने की अनुमति दी. इससे कुछ दिन पहले ही उन्हें पाकिस्तान के सैन्य शासक अयूब ख़ान के मंत्रिमंडल में वाणिज्य मंत्री नियुक्त किया गया था.

पाकिस्तान में मुआवज़े का दावा

एजी नूरानी के मुताबिक़, इससे दो साल पहले 1956 में भुट्टो ने पाकिस्तान में दावा पंजीकरण अधिनियम 1955 के तहत मुआवज़े के लिए केस दायर किया था.

पाकिस्तान में दायर अपने केस में भुट्टो ने बंबई के एस्टोरिया होटल की क़ीमत 12 लाख रुपये और घर की क़ीमत 140,000 रुपये बताई थी.

हालांकि, क्लेम ऑफ़िसर ने होटल के लिए 393,952 रुपये के क्लेम को मंज़ूरी दी. दूसरी संपत्ति के बारे में उन्होंने आदेश दिया कि भुट्टो 140,000 रुपये के हक़दार थे.

भुट्टो ने डिप्टी क्लेम्स कमिश्नर के सामने अपील की. अपील के बाद 6 अक्तूबर 1956 को होटल का मूल्य बढ़ाकर 997,991 रुपये कर दिया.

कमिश्नर ने सरकारी फ़ॉर्मूले के तहत संपत्ति का पूंजीगत मूल्य 443,0400 रुपये तय किया.

एजी नूरानी लिखते हैं कि अंतिम आदेश 18 सितंबर 1957 को जारी किया गया था, यानी भुट्टो के भारत के सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर करने के ठीक एक सप्ताह बाद.

भारतीय सुप्रीम कोर्ट में भुट्टो जिस संपत्ति पर भारत के नागरिक के रूप में अपने अधिकार जता रहे थे, उसी संपत्ति के लिए वह पाकिस्तान में पाकिस्तानी नागरिक के रूप में मुआवज़े की मांग कर रहे थे.

पाकिस्तान की संसद में नागरिकता पर सवाल

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इमेज कैप्शन, 1967 में जब भुट्टो ने अयूब ख़ान का मंत्रिमंडल छोड़ा तब उनकी नागरिकता पाकिस्तान की संसद में बहस का मुद्दा बन गई

भुट्टो के अयूब ख़ान के मंत्रिमंडल से अलग होने के एक साल बाद, यानी साल 1967 में भुट्टो की नागरिकता पाकिस्तान की संसद में बहस का मुद्दा बन गई.

तीन मार्च की अपनी डायरी में अयूब ख़ान ने लिखा था, "भारत से कुछ दस्तावेज़ मेरे हाथ लगे हैं, जिनसे ज़ाहिर होता है कि मिस्टर भुट्टो 1958 तक ख़ुद को भारतीय नागरिक घोषित करते रहे थे और कहते थे कि वह कराची में महज़ अस्थायी तौर पर रह रहे हैं. मैंने इनकी सत्यता की जांच के लिए कहा है. इससे ज़ाहिर होता है कि यह व्यक्ति किस तरह सिद्धांतहीन और बेईमान है."

30 जून 1967 की अयूब ख़ान की डायरी में दर्ज है, "नेशनल असेंबली में एक कठिन सवाल उठाया गया. 1958 में मंत्री बनने से पहले तक भुट्टो भारतीय अदालतों में यह ऐलान कर रहे थे कि वह कराची में रहने वाले एक भारतीय नागरिक हैं. इसका मक़सद उस संपत्ति के लिए कुछ मुआवज़ा हासिल करना था, जो उनके माता-पिता भारत में छोड़ गए थे. असल में, वे लगभग 150,000 रुपये के लिए अपना ज़मीर बेच रहे थे. हमें हाल ही में इसके बारे में पता चला, जब भारतीय संसद में इस मुद्दे पर बहस हुई और यह भारतीय अख़बारों में प्रकाशित हुआ."

अंग्रेज़ी अख़बार 'डॉन' की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, "1958 में मंत्री बनने तक ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो की नागरिकता के मुद्दे पर आज 30 जून को प्रश्नकाल के दौरान नेशनल असेंबली में हलचल मच गई. सत्ताधारी दल के सदस्य हबीब-उर-रहमान भंडारी ने एक संक्षिप्त नोटिस के माध्यम से यह मामला उठाया था."

"विपक्षी सदस्यों के पूरक प्रश्नों का जवाब देते हुए सूचना मंत्री ख़्वाजा शहाबुद्दीन ने कहा कि प्रथम दृष्टया दस्तावेज़ों से पता चलता है कि 1958 तक भुट्टो ने ख़ुद को पाकिस्तान में पाकिस्तानी नागरिक और भारत में भारतीय नागरिक घोषित किया था. विपक्ष के कुछ सदस्यों ने बार-बार ऊंची आवाज़ में कहा कि इस स्तर पर इस मुद्दे को उठाने के पीछे दुर्भावनापूर्ण इरादा था."

"भंडारी ने विदेश मामलों के संसदीय सचिव से पूछा था कि क्या उन्हें पूर्व विदेश मंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो की भारतीय नागरिकता पर किसी भारतीय मंत्री के बयान की जानकारी है. संसदीय सचिव अब्दुल अव्वल भुइया ने हां में जवाब दिया."

उन्होंने सदन में एक लिखा हुआ बयान पढ़कर सुनाया, जिसमें कहा गया था, "19 नवंबर 1965 को राज्यसभा में अपील प्रस्ताव के जवाब में भारत के तत्कालीन शरणार्थियों के पुनर्वास मामलों के मंत्री मिस्टर त्यागी ने कहा था कि ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो ने दावा किया था कि वह एक भारतीय नागरिक हैं और हमेशा से भारतीय नागरिक रहे हैं."

"त्यागी ने यह भी कहा कि भुट्टो ने पाकिस्तान के वाणिज्य मंत्री बनने के बाद 1958 में ही पाकिस्तान में बसने का अंतिम निर्णय लिया और भारतीय सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर कस्टोडियन के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपनी अपील वापस लेने की मांग की."

भुट्टो ने आरोपों के जवाब में क्या कहा?

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इमेज कैप्शन, 13 अगस्त 1958 को भुट्टो ने अपनी अपील वापस लेने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय में आवेदन किया था

सलमान तासीर ने अपनी किताब 'भुट्टो: ए पॉलिटिकल बायोग्राफ़ी' में लिखा है कि 1965 में जब भारत के शरणार्थी पुनर्वास मंत्री ने ये आरोप लगाए थे, तो पाकिस्तान सरकार ने इन आरोपों का सिरे से खंडन किया था.

सलमान तासीर लिखते हैं, "यह आरोप बंबई में शाह नवाज़ भुट्टो का एक घर बेचने से पैदा हुआ था, जो उनके बेटे ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो के नाम पर था. चूंकि भुट्टो उस समय नाबालिग़ थे, इसलिए घर की बिक्री से प्राप्त आय को उनकी ओर से अदालत में जमा किया गया था. भारत के बंटवारे के बाद भुट्टो संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए और 6 जुलाई 1949 को उन्हें इवैक्यूई संपत्ति अधिनियम के तहत इवैक्यूई संपत्ति का मालिक घोषित किया गया. इसका मतलब था कि वे अपनी रक़म की वापसी के लिए सिर्फ़ पाकिस्तान की अदालत में याचिका दायर कर सकते थे."

उस समय के ज़्यादातर लोगों की तरह भुट्टो ने 'ब्रिटिश भारतीय' पासपोर्ट पर मेरिका की यात्रा की थी. इसलिए उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय अदालत के पास उन्हें इवैक्यूई संपत्ति का मालिक घोषित करने का कोई अधिकार नहीं है.

अपने पैसे वापस पाने के लिए की गई कुछ लापरवाह कोशिशों के नतीजे में उन्होंने ऐसे बयान दिए, जिनकी वजह से आगे चलकर उन्हें शर्मिंदा होना पड़ा.

सलमान तासीर के मुताबिक़, उसी समय वह पाकिस्तान में मुक़दमेबाज़ी के ज़रिए अपनी जमा रक़म को वसूल करने की कोशिश भी कर रहे थे और वह ख़ुद को पाकिस्तानी नागरिक के तौर पर पेश कर रहे थे.

सलमान तासीर ने अपनी किताब में लिखा है, "भुट्टो के इस आचरण में कुछ भी रहस्यमय या दुर्भावनापूर्ण नहीं था. वे केवल 20 साल के थे, जब उन्होंने रिफ़ंड के लिए आवेदन किया था और बॉर्डर के दोनों तरफ़ संपत्ति के मुद्दों पर पाकिस्तानियों और भारतीय नागरिकों के बीच इस तरह की जटिल क़ानूनी खींचतान आम थी. हालांकि, उन्हें इस मामले पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी. उन्होंने अपने बचाव में कहा कि वह और उनका परिवार लंबे समय से सिंध में रह रहे थे. हालांकि, वह भारतीय पासपोर्ट पर अमेरिका गए थे, लेकिन उन्होंने जुलाई 1949 में पाकिस्तानी पासपोर्ट हासिल कर लिया था."

30 नवंबर 1967 को भुट्टो ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की स्थापना की.

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के संस्थापक सदस्य रफ़ी रज़ा ने अपनी किताब 'ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो एंड पाकिस्तान, 1967-1977' में लिखा है, "अयूब ख़ान के सूचना मंत्री ने नेशनल असेंबली में उस आरोप को दोहराया, जो 1965 के युद्ध के बाद भारतीय संसद में लगाया गया था कि भुट्टो ने नवंबर 1958 में केंद्रीय मंत्री बनने के बाद भारतीय नागरिकता के आधार पर बंबई की संपत्ति पर अपना दावा वापस ले लिया था."

इन आरोपों को 'डॉन' ने 2 जुलाई 1967 के एक संपादकीय में दोहराया था.

रफ़ी रज़ा लिखते हैं, "लेख का शीर्षक था, 'अफ़सोसनाक खुलासे'. चूंकि मंत्री के आरोपों को संसदीय विशेषाधिकार के तहत क़ानूनी रूप से संरक्षण मिला हुआ था, इसलिए आरोपों का खंडन करते हुए एक विस्तृत जवाब जारी करने और मानहानि के आरोप पर 'डॉन' को क़ानूनी नोटिस भेजने का निर्णय लिया गया. कई वकील इस मामले में शामिल होने से बचते रहे. मैंने अख़बार को एक क़ानूनी नोटिस भेजा, जिसमें मांग की गई कि वह अपने आरोप वापस ले और हर्जाने का भुगतान करे."

रफ़ी रज़ा ने लिखा है, "हमने अदालत का दरवाज़ा नहीं खटखटाने का फ़ैसला किया क्योंकि उस मामले में हमें मानहानि की लंबी क़ानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता."

भारत की संसद में फिर उठा मामला

8 अगस्त 1967 को 'द हिंदू' की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के विदेश मंत्री एमसी छागला ने 7 अगस्त को लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान कहा था कि पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो का मामला "दोहरी वफ़ादारी" यानी 'डुअल लॉयल्टी' का मामला था.

"हेम बरूआ के एक सवाल के जवाब में विदेश मंत्री ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि भुट्टो भारत लौटना चाहेंगे. यह पूछे जाने पर कि अगर 'गुमराह बेटा' वापस आ जाता है तो क्या सरकार उन्हें भारतीय नागरिकता देने पर विचार करेगी, विदेश मंत्री ने कहा कि भुट्टो की वापसी एक काल्पनिक परिदृश्य है. हालांकि, अगर वे वापस लौटते हैं, तो देश का नागरिकता क़ानून उनके मामले का फ़ैसला करेगा."

"छागला ने कहा कि भुट्टो के हालिया भाषणों से पता चलता है कि वह भारत के बारे में 'शत्रुतापूर्ण और ज़हरीली' भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, जैसा कि उन्होंने अतीत में किया था. उन्होंने कहा, 'अगर भुट्टो अपनी नागरिकता बदलने का फ़ैसला करते हैं तो क्या सरकार उन्हें बम्बई में उनकी संपत्ति वापस देने पर विचार करेगी?' सचिव ने स्पष्ट रूप से उत्तर दिया, 'नहीं, सर!'"

जब संसद सदस्य ने प्रधानमंत्री से जवाब मांगा, तो इंदिरा गांधी ने भी ना में सिर हिलाया.

स्टेनली वोलपर्ट लिखते हैं कि 1977 में प्रधानमंत्री भुट्टो की सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद ज़िया-उल-हक़ की सरकार ने भी भुट्टो की गिरफ़्तारी के बाद प्रकाशित कई श्वेत पत्रों में एक दशक पहले अयूब ख़ान की सैन्य सरकार की तरह ज़ुल्फ़िक़ार भुट्टो को बदनाम करने की कोशिश की.

यह दावा भी किया गया था कि अमेरिका और ब्रिटेन में अपने प्रवास के दौरान भुट्टो ने हमेशा ख़ुद को भारतीय नागरिक माना था. हालांकि, साफ़ तौर पर ये दावे झूठे थे.

स्टेनली वोलपर्ट ने अपनी किताब में लिखा है, "वतन वापसी के बाद उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अपने पिता की बम्बई की ज़ायदाद की मुनासिब क़ीमत हासिल करने की कोशिश ज़रूर की, लेकिन अमेरिका में उनका अधिकतर वक़्त अपने दोस्तों और सामाजिक संगठनों को पाकिस्तान और नई दुनिया में पाकिस्तान की अहमियत के बारे में समझाते हुए बीता."

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Source: BBC Hindi · वक़ार मुस्तफ़ा

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