जब आसमान में राज करते थे विशालकाय शिकारी पक्षी, इंसानी बच्चों का भी करते थे शिकार
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- Author, कैथरीन लैथम
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
प्रकाशित 2 मिनट पहले
पढ़ने का समय: 11 मिनट
चेतावनी: इस कहानी में कुछ ऐसी बातें हैं, जो पाठकों को परेशान कर सकती हैं.
डायनासोर का अंत करने वाला उल्कापिंड जब धरती से टकराया, तो उसके बाद करोड़ों साल तक आसमान में विशाल पक्षियों का राज रहा. वे उस समय के सबसे ताक़तवर शिकारियों में शामिल थे और इंसान भी उनका शिकार बनते थे.
करीब 28 लाख साल पहले की बात है. हमारे प्राचीन पूर्वजों का तीन साल का एक बच्चा दक्षिण अफ़्रीका के घास के मैदान में घूम रहा था. उसके दांत अभी निकल ही रहे थे.
ऑस्ट्रेलोपिथेकस अफ़्रीकानस प्रजाति के इस बच्चे को पता नहीं था कि आसमान से कोई उसे देख रहा है.
अचानक एक विशाल शिकारी पक्षी नीचे आया. उसने बच्चे को पकड़ लिया और मार डाला.
यह पक्के तौर पर नहीं मालूम कि उस बच्चे को किस पक्षी ने खाया था. उसे अब "ताउंग चाइल्ड" के नाम से जाना जाता है.
लेकिन उसकी आंखों के नीचे मिले गहरे निशान चील के पंजों से होने वाले निशानों जैसे हैं. चील अक्सर इसी तरह अपना शिकार करते हैं. वे शिकार का कुछ हिस्सा पेड़ पर रख देते हैं और बाकी अपने घोंसले में ले जाते हैं.
करोड़ों साल तक रहा विशाल पक्षियों का राज़
पाषाण युग में ज़िंदा रहना आसान नहीं था. उस समय शुरुआती इंसानों के आसपास कई विशाल जानवर रहते थे.
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उस समय शुरुआती इंसानों के आसपास कई विशाल जानवर रहते थे. इनमें हाथी जैसे बड़े जानवर, भारी शरीर वाले दूसरे जीव, लंबे नुकीले दांतों वाली जंगली बिल्लियां और बच्चों को उठा ले जाने वाले विशाल पक्षी शामिल थे.
पक्षियों से अलग दूसरे डायनासोरों के ख़त्म होने और बड़े हिमयुग की शुरुआत के बीच करोड़ों साल तक आसमान पर इन विशाल पक्षियों का राज रहा.
माना जाता है कि इन पक्षियों ने इंसानों के विकास की दिशा पर भी गहरा असर डाला. हालांकि उनके इस असर पर बहुत कम ध्यान दिया गया है.
कुछ जानकारों का मानना है कि बच्चों को उठा ले जाने वाले पक्षियों की पुरानी कहानियां भी इन्हीं विशाल पक्षियों से जुड़ी हो सकती हैं. पक्षी ख़त्म हो गए, लेकिन उनसे जुड़ी कहानियां दुनिया की कई संस्कृतियों में बनी रहीं.
कहां से आए ये विशालकाय पक्षी?
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जब पक्षियों से अलग दूसरे डायनासोर धरती से ख़त्म हुए, तो आसमान धूल से भर गया. ज़्यादातर पेड़-पौधे भी नष्ट हो गए.
जानवरों के खाने के लिए बीजों के अलावा बहुत कम चीज़ें बची थीं. लेकिन पक्षियों के लिए बीज काफ़ी थे.
उन्हें अपना शिकार बनाने वाले जानवर भी नहीं बचे थे. इस कारण ज़मीन पर रहने वाले और चोंच वाले कुछ छोटे पक्षियों को बढ़ने का मौक़ा मिला. धीरे-धीरे उनका आकार बहुत बड़ा होता गया.
इनमें से कुछ पक्षी पेड़-पौधे खाते थे. ऑस्ट्रेलिया के ड्रोमोर्निथिडी ऐसे ही पक्षी थे. उन्हें "डेमन डक्स ऑफ़ डूम" कहा जाता है.
वे आज की बत्तखों जैसे दिखाई देते थे, लेकिन उनसे करीब 100 गुना बड़े और गायों से भी भारी थे.
कुछ पक्षी समुद्र के ऊपर उड़कर शिकार करने लगे. इनमें दक्षिण कैरोलाइना का पेलागोर्निस सैंडर्सी भी शामिल था.
इसे अब तक का सबसे बड़ा उड़ने वाला पक्षी माना जाता है. इसके दोनों पंखों के बीच की दूरी सात मीटर थी.
कुछ दूसरे पक्षियों ने ज़मीन पर रहने वाले बड़े शिकारियों की जगह ले ली. टायरानोसॉरस जैसे बड़े शिकारी डायनासोरों के ख़त्म होने के बाद उनकी जगह ख़ाली हो गई थी.
जहां बड़े जानवर शिकार के लिए मौजूद होते हैं, वहां उनसे भी बड़े शिकारी पैदा होने लगते हैं. हमारे पूर्वजों को इन्हीं विशाल पक्षियों का सामना करना पड़ा था.
आज के चीलों से मिले पुराने हमलों के सुराग
अमेरिका की ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी में प्राइमेट्स के जानकार स्कॉट मैकग्रा कहते हैं, "जब से प्राइमेट्स मौजूद हैं, तभी से शिकारी पक्षी भी मौजूद हैं."
प्राइमेट्स में इंसान, बंदर और उनसे जुड़े दूसरे जीव शामिल होते हैं.
मैकग्रा कहते हैं, "शिकारी पक्षी हमेशा से प्राइमेट्स का शिकार करते आए हैं. इनमें हम और हमारे रिश्तेदार भी शामिल हैं."
हमारे पूर्वजों और विशाल पक्षियों के बीच हुए इस पुराने संघर्ष की झलक आज भी जंगलों में दिखाई देती है.
मैकग्रा ने आइवरी कोस्ट के ताई जंगल में 600 से अधिक प्राइमेट्स के अवशेषों की जांच की. इन सभी को अफ़्रीकी क्राउन्ड ईगल समेत दूसरे शिकारी पक्षियों ने मारा था.
जांच के दौरान मैकग्रा ने देखा कि बंदरों की खोपड़ी पर मिले निशान ताउंग चाइल्ड के अवशेषों पर मिले निशानों जैसे थे.
कई खोपड़ियों में आंख की हड्डी वाले गड्ढे का निचला हिस्सा टूटा हुआ था.
मैकग्रा कहते हैं, "चील ने या तो अपनी चोंच से उनकी आंखें निकाली थीं या पंजे से उन्हें फाड़कर बाहर निकाला था."
वह बताते हैं, "हमारे अध्ययन की जांच करने वालों में से एक व्यक्ति उस जगह गया, जहां पुराने जीवों के अवशेष रखे हुए थे. उसने ताउंग चाइल्ड के अवशेष निकाले और पाया कि दोनों पर हुआ नुक़सान बिल्कुल एक जैसा था."
मैकग्रा का मानना है कि शिकारी पक्षी हमारे इंसानी पूर्वजों को अक्सर खाते रहे होंगे.
उनका यह भी मानना है कि पक्षियों का शिकार बनने के ख़तरे ने प्राइमेट्स के विकास की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाई होगी. इंसान भी प्राइमेट्स के इसी समूह में आते हैं.
वह कहते हैं, "अगर हम वर्षों से जमा किए गए इंसानी अवशेषों को अब दोबारा ध्यान से देखें, तो इस बात की काफ़ी संभावना है कि हमें शिकारी पक्षियों के हमलों के और निशान मिलें."
"अब हमें पता है कि हमें किस तरह के निशान तलाशने हैं. ताई के जंगल में जो कुछ दिखा है, अगर वह कोई संकेत है, तो ऐसे हमले सामान्य रहे होंगे."
शिकारी पक्षियों के कारण इंसानों में क्या बदला?
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ब्रिटेन की ब्राइटन यूनिवर्सिटी में पुराने समय के इंसानों का अध्ययन करने वाले जेम्स कोल कहते हैं कि प्राचीन इंसानों के अवशेषों से साफ़ पता चलता है कि शुरुआती इंसान भी दूसरे जानवरों का शिकार बनते थे.
वह कहते हैं, "ख़ासतौर पर शुरुआती इंसानी प्रजातियां, जैसे ऑस्ट्रेलोपिथेकस अफ़्रीकानस का वह बच्चा, जिसे एक चील ने खा लिया था."
कोल के मुताबिक़, हमारे शुरुआती पूर्वज कई शिकारी जानवरों का भोजन बनते थे.
वह कहते हैं, "इसमें कोई शक नहीं कि हमारा शिकार किया जाता था."
पक्षियों के अलावा तेंदुए, लकड़बग्घे और विशाल मगरमच्छ भी शुरुआती इंसानों का शिकार करते थे. इन सभी से बचने की ज़रूरत ने हमारे पूर्वजों के विकास पर असर डाला होगा.
माना जाता है कि विशाल पक्षियों का शिकार बनने के ख़तरे के कारण हमारे शरीर और सोच में भी बदलाव आए.
मिसाल के तौर पर दो पैरों पर खड़े होने की हमारी क्षमता से शिकारियों को दूर से देखना आसान हुआ होगा.
एक-दूसरे का साथ देना, मिलकर रहना, एक-दूसरे पर निर्भर होना और साथ मिलकर अपनी रक्षा करना भी हमारे पूर्वजों के काम आया होगा.
कोल कहते हैं कि समूह में कितने लोग हैं, यह बहुत अहम हो गया था. समूह में लोगों की संख्या ज़्यादा होने पर सुरक्षा भी बढ़ जाती थी.
मैकग्रा कहते हैं कि शिकारी पक्षियों से बचने के लिए भी बड़े समूह में रहना बेहतर था.
शेर और भेड़िये जैसे शिकारी अपने शिकार का पीछा करते हैं. लेकिन शिकारी पक्षी अक्सर छिपकर अचानक हमला करते हैं.
क्राउन्ड ईगल जैसे चील पेड़ों के बीच छिपे रहते हैं और सही मौक़ा मिलते ही हमला कर देते हैं.
इससे संकेत मिलता है कि इंसानों में समूह बनाकर रहने की आदत के पीछे शिकारी पक्षियों से बचने की ज़रूरत भी रही होगी.
समूह में कई लोग अलग-अलग दिशाओं में नज़र रख सकते थे और अचानक होने वाले हमले की चेतावनी दे सकते थे. इसे "मैनी आइज़ इफ़ेक्ट" यानी कई लोगों के एक साथ निगरानी करने का असर कहा जाता है.
क्या भाषा का विकास भी इसी ख़तरे से जुड़ा है?
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कोल कहते हैं कि बड़े समूहों में रहने से भाषा के विकास में भी मदद मिली होगी.
वह कहते हैं, "बड़े समूह में लोग अलग-अलग काम करने लगते हैं. कुछ लोग एक काम करते हैं और बाकी कोई दूसरा काम. इसके लिए आपस में तालमेल बनाना ज़रूरी होता है."
"जब समूह के लोग अलग-अलग जगहों पर काम करने लगते हैं, तो केवल एक-दूसरे को देखकर तालमेल नहीं बनाया जा सकता."
कोल कहते हैं कि हाथ के इशारों से बात करने के लिए लोगों का एक-दूसरे को देख पाना ज़रूरी है.
लेकिन जब नज़र से दूर मौजूद किसी साथी तक कोई बात पहुंचानी हो, जैसे किसी शिकारी के आने की चेतावनी देनी हो, तो भाषा की ज़रूरत पड़ती है.
मैकग्रा का मानना है कि आसमान से आने वाले ख़तरे से बचने की कोशिश ने भाषा के विकास की शुरुआत में भी भूमिका निभाई होगी.
सबूत बताते हैं कि ज़्यादातर प्राइमेट्स अलग-अलग तरह के शिकारियों के लिए एक जैसी चेतावनी देते हैं. मिसाल के तौर पर वे शेर और तेंदुए के लिए एक ही तरह की आवाज़ निकाल सकते हैं.
लेकिन शिकारी पक्षियों को देखकर वे एक अलग और ख़ास आवाज़ निकालते हैं.
मैकग्रा के मुताबिक़, किसी ख़ास ख़तरे के लिए इस तरह अलग आवाज़ निकालना इंसानी भाषा बनने से पहले का एक रूप माना जा सकता है.
अमेरिका के आसमान पर विशाल पक्षियों का राज
माना जाता है कि विशाल शिकारी पक्षियों और हमारे इंसानी पूर्वजों का सबसे ज़्यादा आमना-सामना अमेरिकी महाद्वीपों में हुआ था.
अमेरिका के शुरुआती इंसानों का सामना टेराटॉर्न नाम के विशाल पक्षियों से हुआ होगा.
ये मांस खाने वाले पक्षी थे और अपने शिकार को पूरा निगल सकते थे.
ये पक्षी कॉन्डोर जैसे दिखाई देते थे. इनके दोनों पंखों के बीच की दूरी छह मीटर होती थी. ये मरे हुए जानवर भी खाते थे और ख़ुद शिकार भी करते थे.
लंदन के नेचुरल हिस्ट्री म्यूज़ियम में पक्षियों के शरीर से जुड़े नमूनों की देखभाल करने वाली सीनियर क्यूरेटर जोआन कूपर कहती हैं कि ये पक्षी इतने विशाल थे कि केवल अपने पंख खोलकर और ऊपर उठती हवा की मदद से उड़ सकते थे.
टेराटॉर्न ने करीब ढाई करोड़ साल तक आसमान पर राज किया. वे करीब 10 हज़ार साल पहले ख़त्म हुए. उस समय तक इंसान अमेरिकी महाद्वीपों में पहुंच चुके थे.
कूपर कहती हैं कि टेराटॉर्न की वजह से "थंडरबर्ड" की कहानियां शुरू हुई होंगी.
अमेरिका के मूल निवासियों की कहानियों में थंडरबर्ड के पंख बहुत विशाल बताए गए हैं. माना जाता था कि वह गरज और बिजली को नियंत्रित कर सकता है.
एयोलोर्निस इनक्रेडिबिलिस को "इनक्रेडिबल टेराटॉर्न" भी कहा जाता था. इसने दक्षिणी कैलिफ़ोर्निया और नेवादा के इलाक़ों में अपना डर फैला रखा था. इसके दोनों पंखों के बीच की दूरी साढ़े पांच मीटर थी.
इससे आगे उत्तर में ओरेगॉन में टेराटॉर्निस वुडबर्नेंसिस पाया जाता था. उसके दोनों पंखों के बीच की दूरी करीब चार मीटर थी.
आसमान में उड़ने वाला यह विशाल पक्षी करीब 12 हज़ार साल पहले रहता था.
इसके अवशेष हाथी जैसे विशाल मैमथ और मैस्टोडॉन, ज़मीन पर रहने वाले बड़े स्लॉथ और शुरुआती इंसानों के अवशेषों के साथ मिले हैं.
बच्चों को उठा ले जाने वाले विशाल चील की कहानी
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दुनिया के दूसरे छोर पर न्यूज़ीलैंड में माओरी लोगों के बीच "ते होकियोई" की कहानी सुनाई जाती है.
कहानी के मुताबिक़, यह बच्चों को उठा ले जाने वाला एक विशाल चील था.
जानकारों का मानना है कि यह कहानी वास्तव में कभी मौजूद रहे विशाल हास्ट्स ईगल से जुड़ी हो सकती है. अब यह प्रजाति ख़त्म हो चुकी है.
कूपर कहती हैं कि हास्ट्स ईगल "एक तरह से उड़ता हुआ बाघ था."
उसका वज़न एक वयस्क हार्पी ईगल से लगभग दोगुना था. हार्पी ईगल आज मौजूद सबसे बड़े चीलों में शामिल है.
हास्ट्स ईगल ज़मीन पर रहने वाले मोआ नाम के एक दूसरे विशाल पक्षी का शिकार करता था. मोआ की लंबाई करीब चार मीटर होती थी.
विशाल चील तेज़ी से नीचे आता था. उसके भारी वज़न की वजह से नीचे आते समय उसकी रफ़्तार और बढ़ जाती थी.
वह अपने 10 सेंटीमीटर लंबे पंजों से शिकार की पीठ पर वार करता और उसे ज़मीन पर गिरा देता था.
कूपर कहती हैं, "कुछ मोआ पक्षियों के कूल्हे की हड्डियों पर हमें इन विशाल पंजों के निशान दिखाई देते हैं."
उनका कहना है कि हास्ट्स ईगल इंसानों पर भी इसी तरह हमला कर सकता था.
वह कहती हैं, "बच्चों को निश्चित रूप से ख़तरा रहा होगा. यह नज़ारा अद्भुत भी रहा होगा और बेहद डरावना भी."
शायद यही वजह है कि बच्चों को उठा ले जाने वाले पक्षियों की कहानियां माओरी और उत्तरी अमेरिकी संस्कृतियों में लंबे समय तक बनी रहीं.
ऐसी कहानियां यूनान की पुरानी कथाओं में भी मिलती हैं. वहां सारस बच्चों को पहुंचाते नहीं थे, बल्कि उन्हें चुरा ले जाते थे.
कूपर कहती हैं, "जब ये पक्षी ऊपर से उड़ते थे, तो उनकी लंबी छाया पड़ती थी. दुनिया भर की संस्कृतियों पर भी उन्होंने ऐसी ही लंबी छाप छोड़ी."
क्या चील आज भी बच्चों को उठा सकते हैं?
चील का बच्चों को उठाना केवल प्राचीन इतिहास की बात नहीं हो सकती.
19वीं सदी में अमेरिका के टेनेसी से आई एक ख़बर में एक बच्चे को "विशाल भूरे चील" के उठा ले जाने का ज़िक्र मिलता है.
ख़बर के मुताबिक़, चील तेज़ी से नीचे आया और उसने अपने विशाल पंजे छोटे लड़के के कपड़ों में फंसा दिए.
चील बच्चे को लेकर उड़ गया. घर में काम करने वाली एक लड़की उसके पीछे दौड़ी.
करीब दो मील दूर जाकर पक्षी ने कुछ देर के लिए बच्चे को नीचे रख दिया.
पास मौजूद एक शिकारी ने ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ लगाई. इससे पक्षी डरकर उड़ गया.
अच्छी बात यह रही कि "स्वस्थ और गुलाबी चेहरे वाले" उस बच्चे को कोई चोट नहीं आई.
इंसान बच गए, विशाल पक्षी ख़त्म हो गए
कुल मिलाकर विशाल शिकारी पक्षियों ने करीब पांच करोड़ साल तक आसमान पर राज किया.
फिर करीब 26 लाख साल पहले धरती प्लाइस्टोसीन काल के बड़े हिमयुग में पहुंच गई.
प्लाइस्टोसीन के दौरान धरती के मौसम में बहुत बड़े और तेज़ बदलाव हुए. माना जाता है कि इन बदलावों ने इंसानों के विकास को आगे बढ़ाया.
लेकिन करीब 11,700 साल पहले इस दौर के अंत तक लगभग सभी विशाल स्तनधारी जीव और सबसे बड़े शिकारी पक्षी ख़त्म हो चुके थे.
जानकार पक्के तौर पर नहीं जानते कि इन विशाल जानवरों के ख़त्म होने के लिए बदलता मौसम ज़िम्मेदार था या इंसानी शिकारी.
लेकिन जैसे-जैसे इंसान दुनिया में फैलते गए और उन्होंने प्राकृतिक व्यवस्था को बदला, वैसे-वैसे 95 फ़ीसदी तक विशालकाय जानवर भी ख़त्म हो गए.
कूपर कहती हैं, "या तो हम उन्हें खाने की कोशिश कर रहे थे या फिर चीज़ों के लिए उनसे मुक़ाबला कर रहे थे."
उनका मानना है कि शायद इसी से इंसानों और शिकारी पक्षियों के बीच वह तनाव समझ में आता है, जो आज भी मौजूद है.
वह कहती हैं, "ये पक्षी हमें आकर्षित करते हैं और हम उनका सम्मान भी करते हैं, लेकिन हम उनके साथ रहने को लेकर हमेशा ख़ुश नहीं होते."
प्लाइस्टोसीन काल के ख़त्म होने के बाद धरती का मौसम धीरे-धीरे स्थिर होने लगा.
बर्फ़ की विशाल चादरें पीछे हटने लगीं और इंसानों ने खेती शुरू कर दी.
यह एक नए दौर की शुरुआत थी. इंसानों के युग की.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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Source: BBC Hindi · कैथरीन लैथम
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