कराची का मोहट्टा पैलेस: हिंदू कारोबारी का घर जिसे देखकर ठहर जाती है नज़र

कराची की इस इमारत से नज़रें हटाए बिना वहां से गुज़रना मुश्किल है.

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के कराची शहर की इस इमारत से नज़रें हटाए बिना वहां से गुज़रना मुश्किल है
    • Author, रशीद शकूर
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ हिंदी के लिए
    • ........से, वरिष्ठ पत्रकार, कराची से
  • प्रकाशित एक मिनट पहले

  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

पाकिस्तान में कराची के लोग जब क्लिफ़्टन के समुद्र तट की ओर जाते हैं, तो रास्ते में उन्हें गुलाबी और पीले पत्थरों से बनी एक पुरानी इमारत दिखाई देती है. इस इमारत से नज़रें हटाए बिना वहां से गुज़रना मुश्किल है.

कराची की इस बिल्डिंग का नाम मोहट्टा पैलेस है. इसे देखकर इंसान उस दौर में पहुंच जाता है, जब समुद्र की शोर मचाती लहरें क्लिफ़्टन के किनारे से टकराती थीं.

उसी दौर में एक हिंदू मारवाड़ी कारोबारी के मन में समुद्र के बिल्कुल पास यह इमारत बनवाने का ख़्याल आया था. उस कारोबारी का नाम शिव रतन चंद्र रतन मोहट्टा था. उन्होंने अपनी पत्नी के लिए ये महल बनवाया था.

इस महल को बनाने में ख़ास तौर पर जोधपुरी गुलाबी पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है.

रेल की पटरी भी बिछवाई

कराची पर शोध करने वाले दिवंगत पत्रकार अख़्तर बलोच, शोधकर्ता इक़बाल ए. रहमान मांडविया और इतिहासकार उस्मान दमूही ने अपने लेखों में मोहट्टा पैलेस का विस्तार से ज़िक्र किया है.

इक़बाल ए. रहमान मांडविया ने अपनी किताब में लिखा है, "शिव रतन मोहट्टा ने कराची में लोहे का कारख़ाना लगाया था. इसके अलावा उन्होंने सिंध में ख़दरो के पास एक चीनी मिल भी लगाई थी.

चीनी को पास के रेलवे स्टेशन तक आसानी से पहुंचाने के लिए उन्होंने रेल की पटरी भी बिछवाई थी. यह 1939 की बात है."

शिव रतन मोहट्टा के छोटे भाई गोपाल गोरधन दास मोहट्टा ने कराची में हिंदू जिमख़ाना बनवाया था.

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इस तरह कराची की दो महत्वपूर्ण पुरानी इमारतों के साथ मोहट्टा परिवार का नाम हमेशा याद रखा जाता है.

प्रेम की निशानी, प्रेम की कहानी

शिव रतन मोहट्टा ने अपनी पत्नी के जीवित रहते ही ये महल बनवा दिया था.

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इमेज कैप्शन, शिव रतन मोहट्टा ने अपनी पत्नी के जीवित रहते ही ये महल बनवा दिया था

मोहट्टा पैलेस को बनवाने के पीछे शिव रतन मोहट्टा का कोई कारोबारी मक़सद नहीं था.

दरअसल, उनकी पत्नी एक जानलेवा बीमारी से जूझ रही थीं. डॉक्टरों ने शिव रतन मोहट्टा से कहा कि इस बीमारी का इलाज ताज़ी हवा है. अगर उनकी पत्नी ऐसे माहौल में रहेंगी, तो उनकी सेहत बेहतर रहेगी.

शिव रतन मोहट्टा जानते थे कि कराची के समुद्र तट की ताज़ी हवा ही इस परेशानी का सबसे अच्छा हल है.

इसलिए उन्होंने यहां एक बंगला बनवाने का फ़ैसला किया. हालांकि, यह बंगला असल में किसी महल से कम नहीं था.

आज भी प्रेम कहानियों का ज़िक्र करते हुए कहा जाता है कि मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज़ महल की मौत के बाद उनकी याद में ताजमहल बनवाया था.

लेकिन शिव रतन मोहट्टा को अपनी पत्नी की ज़िंदगी प्यारी थी. इसलिए उन्होंने अपनी पत्नी के जीवित रहते ही यह महल बनवा दिया था.

मोहट्टा पैलेस की बनावट

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इमेज कैप्शन, साल 1927 में बनकर तैयार हुआ मोहट्टा पैलेस मुग़ल वास्तुकला की ख़ूबसूरत झलक दिखाता है

यह शानदार इमारत भी भारतीय उपमहाद्वीप के शुरुआती मुस्लिम वास्तुकारों में शामिल अहमद हुसैन आगा की पेशेवर काबिलियत का नतीजा है.

अहमद हुसैन आगा को इस इमारत का नक़्शा तैयार करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी. उन्हें ख़ास तौर पर जयपुर से कराची बुलाया गया था.

उन्होंने कराची में हिंदू जिमख़ाना और चैंबर ऑफ़ कॉमर्स जैसी इमारतों के नक़्शे भी बनाए थे. लेकिन उनके करियर में मोहट्टा पैलेस की एक ख़ास जगह है.

साल 1927 में बनकर तैयार हुआ मोहट्टा पैलेस मुग़ल वास्तुकला की ख़ूबसूरत झलक दिखाता है.

इसे देखकर लगता है, जैसे राजस्थानी राजाओं के एंग्लो-मुग़ल महलों को दोबारा बनाया गया हो.

इसके निर्माण में जोधपुर के गुलाबी पत्थर और गिज़री के स्थानीय पीले पत्थर इस्तेमाल किए गए हैं.

मोहट्टा पैलेस को किसी भी ओर से देखा जाए, यह लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचता है.

इसके गुंबद इसकी ख़ूबसूरती को और बढ़ा देते हैं. इसकी मेहराबें, मीनारें और नक़्शे वाली टाइलें भी देखने लायक हैं.

इस इमारत में बर्मा टीक की मज़बूत लकड़ी इस्तेमाल की गई है.

पत्थरों पर मोर और फूलों के नक़्शे भी बनाए गए हैं. इनमें गेंदे के फूल ख़ास तौर पर दिखाई देते हैं.

किसी समय इसकी छत पर एक छोटा-सा मंदिर भी हुआ करता था.

समय के साथ इस इलाक़े में ऊंची इमारतें बनती चली गईं. इस वजह से अब मोहट्टा पैलेस की छत से समुद्र का नज़ारा पहले जितना ख़ूबसूरत नहीं दिखाई देता.

कभी यहां से समुद्र का बेहद ख़ूबसूरत नज़ारा दिखाई देता था.

वह सुरंग कहां गई?

मोहट्टा पैलेस के अंदर एक सुरंग भी हुआ करती थी. यह सुरंग पास के एक मंदिर तक जाती थी.

महल में रहने वाले लोग इसी सुरंग से मंदिर जाकर पूजा-पाठ करते थे.

लेकिन समय के साथ इस इलाक़े में निर्माण होता गया. इसके बाद सुरंग को बंद कर दिया गया. अब यह केवल यादों का हिस्सा है.

पाकिस्तान बनने के बाद क्या हुआ?

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तान बनने के बाद शिव रतन मोहट्टा कराची में ही रहना चाहते थे

पाकिस्तान के एक राजनेता कुंवर ख़ालिद यूनुस ने 'डॉन' अख़बार को एक पत्र लिखा था.

इसमें उन्होंने साल 2004 में अपनी भारत यात्रा के दौरान एक बुज़ुर्ग से हुई मुलाक़ात का ज़िक्र किया था.

उस बुज़ुर्ग ने उन्हें बताया था कि एक प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्ति ने सेठ शिव रतन मोहट्टा से पैलेस ख़ाली करने को कहा था. उनसे कहा गया था कि यहां सरकारी दफ़्तर बनाए जाने हैं.

कुंवर ख़ालिद यूनुस के मुताबिक़, इसके बाद शिव रतन मोहट्टा ने पाकिस्तान छोड़कर जाने का फ़ैसला किया.

उन्होंने महल की चाबियां अपने मैनेजर को सौंप दीं. साथ ही एक नोट लिखकर कहा कि इसे उस राजनीतिक व्यक्ति को दे दिया जाए.

उस नोट में लिखा था कि अगर उनसे केवल अनुरोध किया जाता, तो वह यह पैलेस तोहफ़े में ही दे देते. इसके बजाय उन्हें इसे ख़ाली करने का आदेश दिया गया.

दरअसल, पाकिस्तान बनने के बाद शिव रतन मोहट्टा कराची में ही रहना चाहते थे. लेकिन उनके लिए ऐसे हालात बना दिए गए कि उन्होंने मुंबई जाने का फ़ैसला कर लिया.

इस बारे में एक और महत्वपूर्ण बात पाकिस्तान के वरिष्ठ नौकरशाह सैयद हाशिम रज़ा ने अपनी किताब 'हमारी मंज़िल' के पेज 96 और 97 पर लिखी है.

वह लिखते हैं, "शिव रतन मोहट्टा बहुत अमीर लोगों में शामिल थे. कराची में उनके कई घर थे, लेकिन वह मोहट्टा पैलेस में रहना पसंद करते थे."

"इस इमारत को विदेश मंत्रालय का दफ़्तर बनाने के लिए चुना गया था."

"14 अगस्त की शाम अल्पसंख्यक समुदाय के प्रमुख लोगों को गवर्नर जनरल हाउस में बुलाया गया था. इनमें शिव रतन मोहट्टा भी शामिल थे."

"वह मोहम्मद अली जिन्ना के पास गए और उन्हें पाकिस्तान का गवर्नर जनरल बनने की बधाई दी. मोहम्मद अली जिन्ना ने भी गर्मजोशी से उनसे हाथ मिलाया."

"शिव रतन मोहट्टा ने सोचा कि सरकार से अपना घर मोहट्टा पैलेस वापस लेने की बात करने का यह सबसे अच्छा मौक़ा है."

"उन्होंने मुझसे यानी हाशिम रज़ा से कहा कि मैं मोहम्मद अली जिन्ना को बताऊं कि किस तरह मोहट्टा पैलेस को सरकारी दफ़्तरों के लिए चुना गया है."

"मैंने मोहम्मद अली जिन्ना को बताया कि हमने केवल उन लोगों के घर चुने हैं, जिनके पास रहने के लिए एक से अधिक मकान हैं."

"मैंने उन्हें बताया कि मोहट्टा के पास कराची में रहने के लिए एक से अधिक घर हैं और वह किसी दूसरे घर में जा सकते हैं."

"मोहट्टा ने जवाब दिया कि यह उनका पसंदीदा घर है."

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इमेज कैप्शन, राजधानी कराची से इस्लामाबाद ले जाए जाने के बाद मोहट्टा पैलेस वीरान हो गया

"उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना से अनुरोध किया. लेकिन जिन्ना ने यह कहते हुए माफ़ी मांग ली कि इस मामले में फ़ैसला लेने का अधिकार उनके पास नहीं है."

"उन्होंने कहा कि आपको इस बारे में फ़ैसला लेने का अधिकार रखने वाले लोगों से अनुरोध करना चाहिए."

"यह सुनकर शिव रतन मोहट्टा हैरान रह गए थे."

पाकिस्तान बनने के बाद आगा हिलाली वहां मुख्य प्रोटोकॉल अधिकारी थे.

उन्होंने लिखा था कि मोहट्टा पैलेस में विदेश मंत्रालय के दफ़्तर तो बना दिए गए, लेकिन शहर से दूर होने के कारण कर्मचारियों को वहां आने-जाने में परेशानी होती थी.

इस समस्या का हल निकालने के लिए सदर की एम्प्रेस मार्केट से बस सेवा शुरू की गई. यह बस कर्मचारियों को मोहट्टा पैलेस लाती और वापस ले जाती थी.

यह वह दौर था, जब क्लिफ़्टन में बहुत कम आबादी थी. वहां समुद्र का पानी और रेत ही दिखाई देते थे.

राजधानी कराची से इस्लामाबाद ले जाए जाने के बाद मोहट्टा पैलेस वीरान हो गया.

जिन्ना की बहन यहां रहीं

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इमेज कैप्शन, जब यह इमारत फ़ातिमा जिन्ना को सौंपी गई, तब इसकी हालत बहुत ख़राब थी

"मैं अकेला ऐसा बच्चा नहीं था, जो क्लिफ़्टन जाते समय रास्ते में दिखाई देने वाले इस पैलेस के बारे में अपने पिता से पूछता था कि यह क्या है."

"जवाब मिलता था कि यहां पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की बहन फ़ातिमा जिन्ना रहती थीं."

यह एक सामान्य और सीधा-सादा जवाब था. मेरे जैसे हर बच्चे को क्लिफ़्टन घूमने जाते समय रास्ते में दिखाई देने वाली इस इमारत के बारे में पूछने पर यही जवाब मिलता था.

फ़ातिमा जिन्ना ने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के मुंबई वाले घर के बदले मोहट्टा पैलेस को चुना था.

हालांकि, शुरुआत में उन्होंने इस इमारत में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी. लेकिन बाद में वह यहां रहने लगीं.

जब यह इमारत फ़ातिमा जिन्ना को सौंपी गई, तब इसकी हालत बहुत ख़राब थी.

इमारत की सफ़ाई कराई गई. पक्षियों के घोंसले और मकड़ियों के जाले हटाए गए.

इस तरह मोहट्टा पैलेस कुछ समय के लिए 'क़स्र-ए-फ़ातिमा' बन गया.

फ़ातिमा जिन्ना की दोस्त बेगम शाइस्ता इकरामुल्लाह ने 'डॉन' अख़बार को दिए एक इंटरव्यू में अपनी पुरानी यादों का ज़िक्र किया था.

बेगम शाइस्ता इकरामुल्लाह मोरक्को में पाकिस्तान की राजदूत रही थीं. उनकी बेटी राजकुमारी सरवत की शादी जॉर्डन के राजकुमार हसन बिन तलाल से हुई थी.

बेगम शाइस्ता इकरामुल्लाह लिखती हैं, "एक शाम फ़ातिमा जिन्ना मुझे मोहट्टा पैलेस की छत पर ले गईं. वहां से समुद्र का नज़ारा बहुत ख़ूबसूरत दिखाई देता था."

"जब फ़ातिमा जिन्ना पहली बार रहने के लिए इस महल में आई थीं, तो मैंने उनसे पूछा था कि क्या यह जगह बहुत बड़ी नहीं है?"

"उन्होंने जवाब दिया था, नहीं, मुझे यह जगह पसंद है."

"वह गुरुवार की शाम थी. उन्होंने महल में रात का खाना खाया."

"लेडी हिदायतुल्लाह के मुताबिक़, उस रात अब्दुल्लाह शाह ग़ाज़ी की दरगाह पर क़व्वाली का कार्यक्रम था. वे लोग पूरी रात वहां बैठकर क़व्वाली सुनते रहे थे."

अयूब ख़ान के ख़िलाफ़ आंदोलन

फ़ातिमा जिन्ना ने सैन्य शासक अयूब ख़ान के ख़िलाफ़ राष्ट्रपति चुनाव लड़ा था.

मोहट्टा पैलेस उस समय तक 'क़स्र-ए-फ़ातिमा' बन चुका था. उस दौर में यह फ़ातिमा जिन्ना के चुनाव प्रचार और आंदोलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र था.

फ़ातिमा जिन्ना लगभग साढ़े तीन साल मोहट्टा पैलेस में रहीं. यहीं उनका निधन हुआ.

उनकी मौत के बारे में आज तक यही माना जाता है कि यह स्वाभाविक मौत नहीं थी.

फ़ातिमा जिन्ना जब तक जीवित रहीं, अपने प्यारे भाई मोहम्मद अली जिन्ना की बरसी का नियमित रूप से आयोजन करती थीं.

वह बोहरा समुदाय के एक ख़ास रसोइये से बिरयानी बनवाती थीं और लोगों को खाना खिलाती थीं.

मोहट्टा पैलेस में फ़ातिमा जिन्ना के इस्तेमाल की कई चीज़ें और दो कारें अब फ़्लैग स्टाफ़ हाउस के म्यूज़ियम में रखी हुई हैं.

मालिकाना हक़ का विवाद

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इमेज कैप्शन, शिरीन जिन्ना चाहती थीं कि मोहट्टा पैलेस में लड़कियों के लिए मेडिकल और डेंटल कॉलेज खोला जाए

फ़ातिमा जिन्ना के निधन के बाद उनकी बहन शिरीन जिन्ना मोहट्टा पैलेस में रहने लगी थीं.

वह साल 1980 में अपने निधन तक यहीं रहीं. लेकिन इससे पहले ही मोहट्टा पैलेस के मालिकाना हक़ को लेकर विवाद शुरू हो गया था और मामला अदालत तक पहुंच गया था.

इस विवाद का नतीजा यह हुआ कि अदालत के आदेश पर मोहट्टा पैलेस को सील कर दिया गया.

शिरीन जिन्ना चाहती थीं कि मोहट्टा पैलेस में लड़कियों के लिए मेडिकल और डेंटल कॉलेज खोला जाए.

उन्होंने इसके लिए एक ट्रस्ट भी बनाया था. लेकिन उनके रिश्तेदार इस इमारत पर मालिकाना हक़ का दावा करने लगे.

अक्तूबर 2021 में सिंध हाई कोर्ट की एकल पीठ ने भी मोहट्टा पैलेस में लड़कियों के लिए मेडिकल और डेंटल कॉलेज खोलने का आदेश दिया.

लेकिन क़ानूनी मुश्किलों के कारण इस आदेश पर अमल करना संभव नहीं था.

साल 1995 में बेनज़ीर भुट्टो ने अपने शासन के दौरान सिंध सरकार को एक बड़ी रक़म दी, ताकि वह मोहट्टा पैलेस ख़रीद सके.

इसके बाद इसका कामकाज संभालने के लिए सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों का एक बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज़ बनाया गया.

यह बोर्ड आज भी मोहट्टा पैलेस को सांस्कृतिक धरोहर के रूप में चला रहा है.

जब मोहट्टा पैलेस सिंध सरकार को मिला, तब यह उजड़ी हुई हालत में था.

इसके बाद इसकी मरम्मत और सजावट का काम शुरू किया गया. यहां एक म्यूज़ियम बनाने का फ़ैसला हुआ, जिसे साल 1999 में आम लोगों के लिए खोल दिया गया.

मोहट्टा पैलेस जितने समय तक बंद रहा, उसके बारे में तरह-तरह की बातें सुनने को मिलती रहीं.

कहा जाता था कि यह भुतहा बंगला है और यहां जिन्न-प्रेत रहते हैं. लोग यहां से गुज़रते हुए भी डरते थे.

मोहट्टा पैलेस म्यूज़ियम में क्या है?

मोहट्टा पैलेस में बने म्यूज़ियम के अंदर तस्वीरें और वीडियो बनाने की अनुमति नहीं है.

लेकिन म्यूज़ियम प्रशासन ने बीबीसी हिंदी को तस्वीरें लेने की विशेष अनुमति दी.

यह म्यूज़ियम पैलेस के ग्राउंड फ़्लोर और पहली मंज़िल पर है.

इसमें तस्वीरों और दुर्लभ चीज़ों के ज़रिए न केवल सिंध, बल्कि इस पूरे क्षेत्र की अलग-अलग प्राचीन सभ्यताओं के बारे में बताया गया है.

यहां गहने और सिक्के हैं. कपड़े और अलग-अलग तरह की हस्तशिल्प की चीज़ें भी रखी गई हैं.

पाकिस्तान के शुरुआती नोट भी इस म्यूज़ियम में मौजूद हैं. इनके बारे में कहा जाता है कि ये स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान के रिकॉर्ड में भी दर्ज नहीं हैं.

मोहट्टा पैलेस में धातु और पत्थर की मूर्तियां भी लोगों का ध्यान खींचती हैं. इनमें महारानी विक्टोरिया की मूर्ति भी शामिल है.

लेकिन अब इन मूर्तियों को ढक दिया गया है. इन्हें केवल ख़ास मौक़ों पर खोला जाता है.

ये मूर्तियां पहले शहर की अलग-अलग जगहों पर लगी थीं. अब इन्हें यहां रखा गया है.

मोहट्टा पैलेस में अब नियमित रूप से फ़ाइन आर्ट से जुड़ी प्रदर्शनियां लगती हैं और मुशायरे भी होते हैं.

आज क्लिफ़्टन इलाक़े में कई देशों के वाणिज्य दूतावास मौजूद हैं.

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो का मशहूर घर '70 क्लिफ़्टन' भी यहीं है.

लेकिन इतना लंबा समय गुज़र जाने के बाद भी मोहट्टा पैलेस में जो आकर्षण और जादू मौजूद है, उसका मुक़ाबला कोई दूसरी इमारत नहीं कर सकती.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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Source: BBC Hindi · रशीद शकूर

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