मोहम्मद सादिक अपने बच्चों के बीच

इमेज कैप्शन, मोहम्मद सादिक अपने बच्चों के बीच
    • Author, तोरपेकई ग़रनी
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़
  • प्रकाशित 2 मिनट पहले

  • पढ़ने का समय: 5 मिनट

अफ़ग़ानिस्तान में बड़े परिवार और ज़्यादा बच्चों वाले दंपती आम माने जाते हैं, लेकिन उरुज़गान प्रांत के रहने वाले मोहम्मद सादिक का परिवार शायद देश के सबसे बड़े परिवारों में से एक है.

मोहम्मद सादिक की चार पत्नियों से 58 बच्चे हैं और उनका सबसे छोटा बच्चा कुछ ही सप्ताह पहले पैदा हुआ है. इतने बड़े परिवार का भरण-पोषण करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है.

वह कहते हैं कि उनकी सारी कोशिश इस बात पर केंद्रित रहती है कि बच्चों के लिए हर दिन खाने-पीने का इंतज़ाम कर सकें. आर्थिक तंगी के कारण परिवार के छोटे बच्चों को भी मुश्किल हालात में जीवन बिताना पड़ रहा है.

इस परिवार की चारों महिलाओं ने भी वर्षों तक लगातार प्रेग्नेंसी, प्रसव और बच्चों के पालन-पोषण की ज़िम्मेदारियां निभाई हैं. मोहम्मद सादिक के मुताबिक़, उनकी चारों पत्नियों की शादी कम उम्र में हुई थी और निकाह के समय उनकी उम्र 13 से 16 वर्ष के बीच थी.

मोहम्मद सादिक हँसते हुए बताते हैं कि कभी-कभी उन्हें अपने सभी बच्चों के नाम भी याद नहीं रहते. उनका कहना है कि वह हर रात सोने से पहले बच्चों की गिनती ज़रूर करते हैं, ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि सभी बच्चे घर में मौजूद हैं.

इस परिवार की महिलाओं ने भी कम उम्र में ही वैवाहिक जीवन की शुरुआत कर दी थी. उनकी शादी उस उम्र में हुई थी, जब वे ख़ुद बचपन और किशोरावस्था के दौर से गुज़र रही थीं. इसके बाद उन्होंने वर्षों तक गर्भधारण, प्रसव और बच्चों के पालन-पोषण की ज़िम्मेदा

इमेज कैप्शन, मोहम्मद सादिक के घर में कई कमरे हैं लेकिन इनमें से किसी भी कमरे में दरवाज़ा नहीं है और हर दरवाज़े की जगह एक पर्दा लटका हुआ है. सभी कमरे दाईं ओर स्थित हैं

घर में समारोह जैसा माहौल

जब छोटे बच्चे अपने पिता के आसपास इकट्ठा होते हैं, तो मोहम्मद सादिक के मुताबिक़, उनका घर शोर, हँसी और चहल-पहल से इस तरह भर जाता है, मानो वहाँ शादी का कोई समारोह चल रहा हो.

हालांकि, इस परिवार की ज़िंदगी में खुशियों के साथ-साथ गंभीर आर्थिक परेशानियां भी हैं. ग़रीबी कभी-कभी इस हद तक बढ़ जाती है कि कुछ बच्चों को रात में भूखे सोना पड़ता है. परिवार में रोजाना केवल दो बार, सुबह और शाम को खाना बनाया जाता है. घर की दो महिलाएं खाना पकाने की ज़िम्मेदारी संभालती हैं.

57 वर्षीय मोहम्मद सादिक एक कार शोरूम में नौकरी करते हैं. उनका कहना है कि ज़्यादा बच्चे पैदा करने के पीछे उनका मक़सद सिर्फ़ 'उम्मत-ए-मुहम्मदी में इजाफा करना' था.

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समाप्त

अपनी एक बेटी के निकाह से जुड़ा दिलचस्प क़िस्सा सुनाते हुए वह कहते हैं, "निकाह पढ़ाने वाले मौलवी साहब ने मुझसे मेरी बेटी का नाम पूछा, तो मैं कुछ देर तक सोचता रहा और ग़लती से दूसरी बेटी का नाम बता दिया. इस पर मौलवी साहब हँसते हुए बोले कि घर जाकर दोबारा पता कर लीजिए, कहीं आपने ग़लत नाम तो नहीं बता दिया."

नाम तक याद नहीं

वह बताते हैं कि इतने ज़्यादा बच्चे होने के कारण अक्सर उन्हें सभी के नाम याद रखने में मुश्किल होती है. इसलिए वह ज़्यादातर बच्चों को 'बेटा' कहकर बुलाते हैं.

मोहम्मद सादिक एक घटना याद करते हुए कहते हैं, "एक रात हम सभी दस्तरखान के आसपास बैठे थे. मैंने बच्चों की गिनती शुरू की, तो एक बच्चा कम निकला. मुझे यह भी पता नहीं था कि जो बच्चा मौजूद नहीं है, वह लड़का है या लड़की. फिर मैंने उनकी मांओं से पूछा, तो उनमें से एक ने बताया कि वह अपने बच्चे को नानी के घर भेज चुकी है और वह रात वहीं बिताएगा."

मोहम्मद सादिक की पहली शादी तब हुई थी, जब उनकी उम्र 20 साल थी. बीबीसी की ओर से कम उम्र की लड़कियों से शादी करने की वजह पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि हर शादी के लिए उन्हें कई वर्षों तक 'तुवियाना' (दुल्हन के परिवार को दी जाने वाली रक़म) जमा करनी पड़ती थी.

जब उनसे इतने बड़े परिवार और बच्चों के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि उनकी पत्नियों की शादी बहुत कम उम्र में हुई थी. बचपन और किशोरावस्था में ही उन्होंने शादी, प्रेग्नेंसी, प्रसव और बच्चों के पालन-पोषण जैसी भारी ज़िम्मेदारियां संभाल ली थीं, जो उनकी जिंदगी का स्थायी हिस्सा बन गईं.

मोहम्मद सादिक और उनकी पत्नियों ने अपनी ज़िंदगी में एक और बड़ी त्रासदी का सामना किया है. वर्षों के दौरान उनके 14 बच्चों की मौत हो चुकी है, जो किसी भी माता-पिता के लिए गहरे दुख का कारण है.

इमेज कैप्शन, मोहम्मद सादिक का रसोईघर. रसोई के पिछले हिस्से में नीले कपड़े पहने एक महिला बैठी हैं. ज़मीन पर एक सफ़ेद बोरी के साथ कई पीले रंग के ड्रम, एक बड़ा भगोना और चायदान रखा हुआ है

माली हालत

विशेषज्ञों के मुताबिक़, कम उम्र में शादी और प्रेग्नेंसी से मां और नवजात, दोनों की सेहत को ख़तरा बढ़ सकता है. वहीं, बार-बार प्रेग्नेंसी से महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधी और भी जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है.

अफ़ग़ानिस्तान उन देशों में शामिल है, जहाँ गर्भावस्था और प्रसव के दौरान महिलाओं की मृत्यु दर अब भी अपेक्षाकृत ज़्यादा है. ख़ासकर ग्रामीण और दूरदराज़ के इलाक़ों में, जहाँ बेहतर मेडिकल सुविधाओं तक पहुंच सीमित है.

दूसरी ओर, ग़रीबी भी इस परिवार की ज़िंदगी को गहराई से प्रभावित कर रही है. सर्दियों में परिवार के सदस्य कमरों में और गर्मियों में आंगन में एक साथ बैठकर खाना खाते हैं, लेकिन उनके पास बुनियादी सुविधाएं भी बहुत कम हैं. जिस जगह पर नहाया जाता है, उसी का इस्तेमाल कपड़े और बर्तन धोने के लिए भी होता है. यही जगह शौचालय के रूप में भी इस्तेमाल की जाती है.

परिवार के बढ़ते ख़र्चों को पूरा करने के लिए सिर्फ़ मोहम्मद सादिक ही नहीं, बल्कि उनके कई बच्चे भी काम करते हैं. कुछ बच्चे काग़ज़, प्लास्टिक और दूसरी इस्तेमाल की जा सकने वाली चीज़ें इकट्ठा करते हैं, ताकि उन्हें ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सके या बेचकर घर के ख़र्चों में योगदान दिया जा सके.

तमाम मुश्किलों के बावजूद यह परिवार रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करने के लिए लगातार संघर्ष कर रहा है. यहां हर दिन खाने, रहने और बच्चों के भरण-पोषण का इंतज़ाम करना एक नई चुनौती बनकर सामने आता है.

मोहम्मद सादिक की ये ख़्वाहिशें

सर्द रातों में कभी-कभी छह या सात लोग एक ही पतला कंबल ओढ़कर सोते हैं. साधारण गद्दों के अलावा इस परिवार के पास सोने के लिए कोई ख़ास सुविधा नहीं है. घर के कमरों में न तो खिड़कियां हैं और न ही पक्के दरवाज़े. प्रवेश द्वारों पर सिर्फ़ पतले पर्दे लटके हुए हैं.

ईंधन के लिए परिवार ज़्यादातर काग़ज़ और दूसरी उपलब्ध चीज़ों को जलाकर आग जलाता है. इन मुश्किलों के बावजूद मोहम्मद सादिक, जो ख़ुद पढ़ाई नहीं कर सके, कहते हैं कि उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल भेजने की पूरी कोशिश की है. हालांकि, सीमित आमदनी के कारण उनके लिए बच्चों की पढ़ाई का ख़र्च उठाना आसान नहीं है.

मोहम्मद सादिक एक कार शोरूम में काम करते हैं. उनका कहना है कि एक कार बिकने पर उन्हें केवल एक हज़ार अफ़ग़ानी का कमीशन मिलता है.

हालांकि, इतने बड़े परिवार की ज़रूरतें उनकी कुल आमदनी से कहीं ज़्यादा हैं. इसलिए मोहम्मद सादिक सरकार, सहायता संगठनों और आर्थिक रूप से सक्षम लोगों से मदद की अपील करते हैं, ताकि वह अपने बच्चों की बुनियादी ज़रूरतें पूरी कर सकें.

अपनी इच्छाओं के बारे में बात करते हुए मोहम्मद सादिक कहते हैं कि उनकी ज़िंदगी की केवल दो बड़ी ख़्वाहिशें हैं.

"मेरी पहली ख़्वाहिश है कि मेरे बच्चे शिक्षा हासिल करें, धर्म और दुनिया का ज्ञान सीखें. दूसरी यह कि उन्हें कभी भूखे पेट न सोना पड़े और उनका पेट भरा रहे."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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Source: BBC Hindi · तोरपेकई ग़रनी

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